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भारत दर्शन : भारत के केविन कार्टरों को समर्पित
इस तस्वीर को ध्यान से देखिये । देखिये कि एक बच्चा भूख से निढाल ज़मीन पर झुका हुआ है। कुछ दूरी पर एक गिद्ध बैठा है। गिद्ध की निगाह बच्चे पर है। और उन दोनों पर निगाह गड़ाए एक तीसरा आदमी भी मौजूद है जो तस्वीर में नहीं है लेकिन पूरी तस्वीर उसके सामने की है। उसने अपने हाथों में कैमरा सजाया है।
यह सूडान है । और साल है 1993।
उस आदमी का नाम केविन कार्टर है।
कैमरे की क्लिक से जिस तस्वीर का जन्म होता है उसे अगले साल पुलित्ज़र सम्मान से नवाज़ा जाता है।
बधाई हो भाई, बधाई हो।
भारतीय पत्रकारिता जगत के लिए इससे बड़ी खुशखबरी भला क्या हो सकती है, जब केविन कार्टर को एक तस्वीर के लिए पुलित्ज़र मिल सकता है, तो हिंदुस्तान के पत्रकारों के लिए तो पुलित्ज़रों की बाढ़ आ जानी चाहिए। और आनी भी चाहिए।
वैसे भी विश्वगुरु बन चुका हिंदुस्तान इसका हकदार है। आखिर भारत में त्रासदियों की कौन-सी कमी है? यहाँ तो हर दिन कोई न कोई ऐसी तस्वीर सामने आती है, जो दुनिया की अंतरात्मा को झकझोर सकती है, बशर्ते दुनिया की अंतरात्मा अभी जीवित हो।
पुरस्कारों की चकाचौंध होती ही ऐसी है कि उसके उजाले में कई बार नैतिकता और दायित्व के प्रश्न ओझल हो जाते हैं। केविन कार्टर की तस्वीर ने भी एक ऐसा ही प्रश्न दुनिया के सामने रखा था।
क्या क्रूरता को कैमरे में कैद कर लेना भर पत्रकारिता है? या उस क्रूरता के सामने खड़े आदमी का कोई नैतिक दायित्व भी होता है?
क्या पत्रकारिता का काम केवल यह बताना है कि एक बच्चा मरने की कगार पर है और गिद्ध उसकी प्रतीक्षा कर रहा है? या उसका दायित्व यह पूछना भी है कि बच्चा उस हालत में पहुँचा कैसे, उसे बचाने की जिम्मेदारी किसकी थी और वह जिम्मेदारी निभाई क्यों नहीं गई?
कार्टर की तस्वीर से जुड़े नैतिक विवाद का अर्थ यह नहीं कि उन्होंने बच्चे की सहायता का कोई प्रयास नहीं किया था। उन्होंने गिद्ध को भगाया था। लेकिन तस्वीर के पीछे का यह तथ्य भी उस व्यापक प्रश्न को समाप्त नहीं करता, जो पत्रकारिता के अस्तित्व से जुड़ा है।
और आज जब मैं इस तस्वीर को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि इसका एक दूसरा नाम भी होना चाहिए।
भारत दर्शन।
जहाँ गिद्ध मुझे वर्तमान भाजपाई सत्ता प्रतिष्ठान का प्रतीक दिखाई देता है, ज़मीन पर असहाय पड़ा बच्चा भारतीय समाज का और कैमरे के पीछे खड़ा आदमी आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता के उस हिस्से का, जो तमाशबीन होने की हद तक संवेदनहीन होता जा रहा है।
इस तस्वीर में दिखाई देने वाला बच्चा मेरे लिए अब केवल सूडान के अकाल का मारा बच्चा नहीं है। उसके चेहरे में आज का भारतीय समाज अपनी बेबसी दर्ज कराता दिखाई देता है।
गौर से देखिए तो सही।
इसमें अंकिता भंडारी को देखिए।
इसमें इंदौर और छिंदवाड़ा के उन बच्चों को देखिए जिनकी मौत ने व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
इसमें बालाघाट और जमुई की घटनाओं से प्रभावित लोगों को देखिए।
राजस्थान की पीड़ित बच्चियों को देखिए। महाराष्ट्र में सामने आती त्रासदियों को देखिए।
इस बच्चे में मणिपुर की हिंसा और विस्थापन से प्रभावित परिवारों को देखिए। बंगाल के उन बच्चों को देखिए जिनकी पीड़ा राजनीतिक शोर में कहीं दब जाती है।
मोरबी पुल हादसे में जान गँवाने वालों को देखिए। थराली की आपदा में उजड़े परिवारों को देखिए।
उन बच्चों को देखिए जिन्हें अस्पतालों में सुरक्षित उपचार मिलना चाहिए था, लेकिन जिनके इलाज में कथित गंभीर लापरवाहियों ने उनके जीवन को संकट में डाल दिया।
मध्य प्रदेश और उड़ीसा की उन घटनाओं को भी याद कीजिए जिनमें साक्ष्य जुटाने के लिए कब्रों से शव निकाले जाने की खबरें सामने आईं। ऐसी परिस्थितियों में मृतकों की गरिमा और परिजनों की पीड़ा का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
ये घटनाएँ एक जैसी नहीं हैं। इनके कारण, परिस्थितियाँ और कानूनी जिम्मेदारियाँ अलग-अलग हैं। किसी मामले में हत्या है, किसी में कथित लापरवाही, किसी में हिंसा और किसी में आपदा। हर मामले में अपराध तथा जवाबदेही का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए।
लेकिन मेरा प्रश्न घटनाओं की कानूनी परिभाषा भर का नहीं है।
मेरा सवाल यह है कि जब व्यवस्था की लापरवाही, सत्ता की उदासीनता या संस्थागत विफलता के कारण बार-बार लोगों की जान जाती है, तो हम उसे केवल दुर्भाग्य कहकर कैसे आगे बढ़ सकते हैं?
क्या यह महज़ संयोग है कि एक के बाद एक त्रासदियाँ सामने आती हैं, कुछ दिनों का शोर उठता है और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है?
मैं इसे सामान्य मानने को तैयार नहीं हूँ।
जहाँ जानबूझकर अपराध हुआ है, उसे हत्या कहा जाना चाहिए। जहाँ आपराधिक लापरवाही हुई है, वहाँ जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
और जहाँ व्यवस्था की विफलता बार-बार नागरिकों को मृत्यु और असुरक्षा के सामने छोड़ देती है, वहाँ उस विफलता को राजनीतिक प्रश्न बनाया जाना चाहिए।
क्योंकि किसी नागरिक की असमय मृत्यु केवल उसके परिवार की निजी त्रासदी नहीं होती। वह उस व्यवस्था की भी परीक्षा होती है जिसने उसे सुरक्षा का आश्वासन दिया था।
इन त्रासदियों को देखते हुए मुझे दो हथियार दिखाई देते हैं।
एक हथियार पर नाम लिखा है व्यवस्था।
और दूसरे पर पत्रकारिता गुदा हुआ है।
पहला अपनी विफलताओं से लोगों को असुरक्षित बनाता है। दूसरा, जब वह सत्ता की निगरानी का दायित्व छोड़ देता है, तो उन विफलताओं को सामान्य बनाकर जवाबदेही से बच निकलने का रास्ता तैयार करता है।
छिंदवाड़ा में बच्चों की मौत हुई। लेकिन क्या मध्य प्रदेश की पत्रकारिता ने उतनी ही दृढ़ता से सवाल पूछे, जितनी दृढ़ता से उसे पूछने चाहिए थे?
क्या राष्ट्रीय मीडिया ने उस त्रासदी का लगातार पीछा किया?
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में महीनों तक चले मीडिया कवरेज को याद कीजिए। तब कैमरों की कमी नहीं थी, सवालों की कमी नहीं थी, स्टूडियो में चीखने वालों की कमी नहीं थी। फिर बच्चों की मौत के मामलों में वैसी निरंतरता क्यों नहीं दिखाई देती?
क्या बच्चों की मृत्यु की पड़ताल किसी फिल्मी सितारे की मृत्यु से कम महत्वपूर्ण है?
किस मीडिया संस्थान ने जिम्मेदार अधिकारियों, संबंधित संस्थाओं और राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही तय करने के लिए लगातार पड़ताल की?
किसने यह पूछा कि ऐसी त्रासदी दोबारा न हो, इसके लिए क्या बदला गया?
या फिर कुछ दिनों की फोटोबाज़ी के बाद सब अपने-अपने दड़बों में लौटकर शुतुरमुर्ग हो गए?
इतिश्री ।
पत्रकारों को बिना साक्ष्य किसी हत्या का कानूनी सहभागी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जब पत्रकारिता सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने में अपनी भूमिका छोड़ देती है, तो वह न केवल उन परिस्थितियों को यथावत बने रहने में मदद करती है, बल्कि अगली त्रासदी के लिए भी ज़मीन तैयार करती है।
यही पत्रकारिता का नैतिक अभियोग है।
मेरी टीस केवल उन पत्रकारों से नहीं है जो खुलेआम सत्ता के पक्ष में खड़े हैं।
जिनकी पत्रकारिता को मोदियाबिंद हो चुका है, उन लंठ-लंपटों से अब शिकायत भी क्या की जाए।
मेरी शिकायत उनसे भी है जिन्हें हम वर्षों से संस्थानों की तरह देखते, सुनते और पढ़ते आए हैं।
वे लोग, जिनकी ओर देखकर भरोसा होता था कि जब पत्रकारिता भटकेगी, जब वह किसी दुराहे पर खड़ी होगी, तो ये लोग उसका रास्ता दिखाएँगे।
लेकिन अब उनकी सुविधाजनक खामोशी, सीमारेखा पर सुरक्षित खेलते रहने की प्रवृत्ति और कुछ मुद्दों पर अपेक्षित मुखरता का अभाव निराशा को और गहरा कर देता है।
हाल में नेहा सिंह राठौर और एबीपी से जुड़े विवाद पर भी पत्रकारिता जगत की प्रतिक्रियाओं ने ऐसे ही सवाल पैदा किए हैं।
मैं ऐसे राजदीपों और दूसरे प्रतिष्ठित पत्रकारों से पूछना चाहता हूँ कि आप लोगों को :
क्या साँप सूँघ गया है?
या कोई ऐसा रोग लग गया है कि पत्रकारिता नाम का बोध ही लकवाग्रस्त होता जा रहा है?
क्या आप लोग पत्रकारिता से अघा चुके हैं?
क्या आपकी संवेदनाएँ मर चुकी हैं?
क्या आपका विवेक समाप्त हो चुका है?
या आपकी आँखें प्रत्यारोपित होकर अब सत्ता के कैमरे की आँखें बन गई हैं?
ऐसा क्या किया है भारतीय समाज ने कि आप उस समाज की आँख नहीं बन पा रहे हैं?
आखिर भारतीय समाज ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि उसकी अपनी पत्रकारिता उसकी आँख बनने से इनकार करती दिखाई देती है?
यह सवाल इसलिए भी आवश्यक है कि पत्रकारिता का संकट केवल बिके हुए पत्रकारों का संकट नहीं है। यह उन पत्रकारों की चुप्पी का भी संकट है जिनसे समाज को अब भी उम्मीद है।
और कई बार यह चुप्पी सत्ता के पक्ष में बोले गए हज़ार शब्दों से अधिक घातक होती है।
ऐसा नहीं है कि भारतीय पत्रकारिता में सत्ता की चाकरी करने वाले पहले नहीं थे।
आज़ादी से पहले भी थे। आज़ादी के बाद भी थे। सत्ता की चौखट पर कलम घिसने वालों की इस देश में कभी कमी नहीं रही।
लेकिन मेरा मानना है कि 2014 के बाद इनकी संख्या, मुखरता और प्रभाव में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
अब पत्रकारिता के एक बड़े हिस्से में सत्ता से सवाल पूछने के बजाय सत्ता की ओर से सवाल पूछने का चलन दिखाई देता है।
नागरिक अधिकार माँगे तो उसकी नीयत पर सवाल।
किसान आंदोलन करे तो उसकी देशभक्ति पर सवाल।
स्त्री न्याय माँगे तो उसके पीछे राजनीतिक षड्यंत्र की तलाश।
पीड़ित परिवार सत्ता से जवाब माँगे तो उसी परिवार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश।
और जो सत्ता जवाब देने के लिए बाध्य होनी चाहिए, वह स्टूडियो की बहसों में जवाबदेही से मुक्त दिखाई देने लगती है।
यह कैसी पत्रकारिता है?
जिस पत्रकारिता को सत्ता की आँख में आँख डालकर सवाल पूछना था, वह जनता की आँख में उँगली डालकर उसी से जवाब माँग रही है।
क्या यह लोकतंत्र की निगरानी व्यवस्था का पतन नहीं है?
और क्या इस पतन के लिए केवल वे पत्रकार जिम्मेदार हैं जो खुलेआम सत्ता का पक्ष लेते हैं? या वे भी, जो सब समझते हुए अपने लिए सुरक्षित चुप्पी चुन लेते हैं?
अंकिता भंडारी को ही देख लीजिए।
एक 19 वर्षीय युवती की हत्या होती है। तीन लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा होती है। कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर प्रश्न उठते हैं। उसके माता-पिता पूरी सच्चाई जानने के लिए वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं।
वे सड़कों पर हैं।
दिल्ली पहुँचते हैं, लेकिन वहाँ भी उन्हें पुलिस हिरासत का सामना करना पड़ता है।
दिल्ली को शायद दृष्टिदोष हो गया है। उसे पीड़ित परिवार की पीड़ा दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके सवालों से उपजी असुविधा तत्काल दिखाई देने लगती है।
क्यों?
क्या पत्रकारिता का काम नहीं था कि वह पूछती, कथित वीआईपी की भूमिका की जाँच कहाँ पहुँची? किन साक्ष्यों की पड़ताल हुई? पीड़ित परिवार की शंकाओं का क्या समाधान हुआ?
क्या सत्ता से इन सवालों के उत्तर माँगना पत्रकारिता के दायित्व में नहीं आता?
यह किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण दोषी घोषित करने का प्रश्न नहीं है। यह उस पीड़ित परिवार के सवालों का प्रश्न है, जिसे न्याय के साथ-साथ सत्य जानने का भी अधिकार है।
अगर पीड़ित परिवार को न्याय की माँग करने के लिए बार-बार सड़क पर उतरना पड़े और पत्रकारिता उसके प्रश्नों का निरंतर पीछा न करे, तो फिर चौथे स्तंभ की उपयोगिता क्या रह जाती है?
इतिहास बताता है कि दुनिया में जब-जब अधिनायकवाद और फासीवादी प्रवृत्तियाँ अपने चरम पर पहुँची हैं, उन्होंने रक्तपात का रास्ता चुनना ही पड़ता है।
इतिहास की ये त्रासदियाँ हर बार एक ही सवाल पूछती हैं कि, क्या किसी समाज को केवल प्रत्यक्ष हिंसा से ही नष्ट किया जाता है?
क्या उसकी चेतना को मारकर, उसके विवेक को कुंद करके, उसके भीतर अन्याय के प्रति उदासीनता पैदा करके उसे भीतर से नहीं तोड़ा जा सकता?
क्या ऐसा संभव नहीं कि लोग मरते रहें और समाज को यह विश्वास दिला दिया जाए कि सब कुछ सामान्य है?
कि अन्याय होता रहे और जनता को समझाया जाता रहे कि यह तो केवल राजनीति है?
कि पीड़ित न्याय माँगता रहे और उसके प्रश्नों को ही संदिग्ध बना दिया जाए?
मुझे लगता है कि विश्वगुरु भारत में सत्ता और मीडिया के संबंधों ने इस दिशा में एक नया, भयावह रूप ग्रहण कर लिया है।
वह औज़ार है, सत्ता के प्रति समर्पित पत्रकारिता।
ऐसी पत्रकारिता जो मृत्यु को आँकड़ा बना दे।
अन्याय को विवाद बना दे।
पीड़ित को संदिग्ध बना दे।
और सत्ता को हर बार निर्दोष दर्शक की तरह प्रस्तुत कर दे।
यह प्रत्यक्ष हिंसा नहीं है। लेकिन यह उस सार्वजनिक चेतना को नष्ट करने का काम करती है जो हिंसा, अन्याय और संस्थागत विफलताओं के विरुद्ध समाज को खड़ा कर सकती थी।
मेरी दृष्टि में आरएसएस-भाजपा की सत्ता-संस्कृति की आलोचना करते समय यह प्रश्न अनिवार्य है कि उसके शासनकाल में मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े हिस्से और राजनीतिक सत्ता के बीच कैसा संबंध विकसित हुआ है।
क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव से जीवित नहीं रहता।
वह जनता के जानने के अधिकार, सवाल पूछने के अधिकार और सत्ता को जवाबदेह बनाने वाली संस्थाओं से जीवित रहता है।
और जिस दिन पत्रकारिता इन अधिकारों की रक्षा करना छोड़ देती है, उस दिन लोकतंत्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रहरी स्वयं संकट का हिस्सा बन जाता है।
मैं पूछना चाहता हूँ, क्या यह देश केवल आरएसएस-भाजपा का है?
क्या संसद में बहुमत का अर्थ राष्ट्र की आत्मा पर मालिकाना हक है?
क्या यह देश उन बच्चों का नहीं है जो छिंदवाड़ा में मारे गए?
क्या अंकिता का यह देश नहीं है?
क्या मणिपुर के विस्थापित परिवारों का यह देश नहीं है?
क्या मोरबी में अपनों को खो देने वालों का यह देश नहीं है?
क्या यह देश उन करोड़ों नागरिकों का नहीं है जो किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं, जो केवल सम्मान, सुरक्षा और न्याय के साथ जीना चाहते हैं?
सत्ता पाँच वर्ष के लिए मिलती है। देश किसी दल को पाँच वर्ष के पट्टे पर नहीं दिया जाता।
बहुमत शासन करने का संवैधानिक अधिकार देता है, समाज की अंतरात्मा पर स्वामित्व नहीं।
याद रहे, राष्ट्र सरकार से बड़ा है। समाज सत्ता से बड़ा है। और मनुष्यता किसी भी विचारधारा से बड़ी है।
केविन कार्टर ने 1994 में आत्महत्या कर ली थी। उनके जीवन का वह दुखद अंत अनेक व्यक्तिगत और मानसिक संघर्षों से जुड़ा था। उसे केवल तस्वीर हुए अपराधबोध का परिणाम मानना कितना उचित है पता नहीं, पर अपराधबोध ने उन संघर्षों को आराम तो नहीं ही दिया होगा, यह तय है ।
लेकिन उनकी इस तस्वीर ने पत्रकारिता के सामने जो नैतिक प्रश्न रखा था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
इसलिए मैं चाहता हूँ कि भारतीय पत्रकारिता अपने भीतर झाँके।
उस पत्रकारिता का अंत करे जो सत्ता की सुविधा के लिए सच से मुँह मोड़ लेती है।
उस पत्रकारिता का अंत करे जो अन्याय को देखती है, दर्ज करती है, लेकिन उससे उपजे सवालों को सत्ता तक पहुँचाने से कतराती है।
उस पत्रकारिता का अंत करे जो पीड़ित की चीख को तमाशा और उसकी मृत्यु को टीआरपी में बदल देती है।
इसलिए मैं पत्रकारिता के आत्मबोध की कामना करता हूँ।
समाज को ऐसे पत्रकारों की आवश्यकता नहीं है जो केवल गिद्ध और बच्चे की तस्वीर उतारकर पुरस्कार की प्रतीक्षा करें।
समाज को ऐसे पत्रकार चाहिए जिनके भीतर तस्वीर खींचते समय भी मनुष्य जीवित रहे।
जो समझें कि कैमरा एक औज़ार है, अंतरात्मा का विकल्प नहीं।
जो जानें कि पत्रकारिता की निष्पक्षता का अर्थ अन्याय के प्रति उदासीनता नहीं होता।
और जो यह पहचान सकें कि सच के प्रति प्रतिबद्धता, सत्ता के प्रति निष्ठा से कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
इसीलिए केविन कार्टर की यह तस्वीर मुझे बार-बार बेचैन करती है।
इस तस्वीर में मुझे केवल सूडान का अकाल नहीं दिखाई देता।
मुझे भारत दिखाई देता है।
इस बच्चे में भारतीय जनता दिखाई देती है, भूखी, असुरक्षित, त्रासदियों से घायल, लेकिन अब भी जीवन की उम्मीद से जुड़ी हुई।
उसके पीछे बैठे गिद्ध में मुझे वर्तमान राजनीतिक सत्ता का वह चेहरा दिखाई देता है, जिसकी संवेदनहीनता के विरुद्ध मेरा आक्रोश है।
और कैमरे के पीछे खड़े केविन कार्टर की जगह मुझे भारतीय पत्रकारिता का वह हिस्सा दिखाई देता है जो सब कुछ देख रहा है, लेकिन अपने नैतिक दायित्व से बचता फिर रहा है।
इसलिए इस तस्वीर को मैं भारत दर्शन कहना चाहता हूँ।
जहाँ गिद्ध वर्तमान सत्ता का प्रतीक है।
जहाँ बच्चा भारतीय समाज है।
और जहाँ कैमरे के पीछे खड़ा पत्रकार उस सवाल का प्रतीक है, जिससे आज भारतीय पत्रकारिता बच नहीं सकती।
क्योंकि प्रश्न केवल यह नहीं है कि गिद्ध उस बच्चे के साथ क्या करेगा।
प्रश्न यह भी है कि कैमरे के पीछे खड़ा आदमी क्या करेगा।
वह तस्वीर खींचकर आगे बढ़ जाएगा?
वह तस्वीर के लिए पुरस्कार की प्रतीक्षा करेगा?
या कभी अपने कैमरे से नज़र हटाकर उस बच्चे की ओर भी देखेगा?
और जब इतिहास इस तस्वीर का हिसाब लिखेगा, तो क्या वह केवल गिद्ध से सवाल करेगा, या कैमरे के पीछे खड़े आदमी से भी पूछेगा, कि जब यह सब हो रहा था, तब तुम क्या कर रहे थे?
यही मेरा भारत दर्शन है।
Maneesh Kothari retweeted
“…भैया 14 छोड़ दीजिए, तीन बार मोदी को वोट दिया है, तीन बार। अपने बाप की कसम खा रहा हूं, मैं अपनी मां की कसम खा कर रहा हूं, जिंदगी में सबसे बड़ा अपराध किया।…”
सवाल : आगे कितनी बार बीजेपी को वोट देंगे आप?
जवाब : “…अब हमारा जूता न दे, जूता न दे। हमारा रोवाँ न दे!…”
Maneesh Kothari retweeted
Kamal khilaane ke chakkar me poore desh ko keechad bana diya.
🤖 Made with AI
Maneesh Kothari retweeted
रे भाई! राजतंत्र का स्वागत करो!
डंकापति ने 25 साल न जाने तपस्या क्या कर ली सीधे भगवान बन गए! सिंहासन के ऐसे मालिक बन गए कि उनसे कोई सवाल ही नहीं पूछ सकता!
जनता टैक्स भरे, ताली बजाए और सवाल पूछने जाओ तो कह दिया जाता है कि आपकी क्षमता नहीं है!
लकड़बग्घों को जवाबदेही शब्द से ही एलर्जी है!
Maneesh Kothari retweeted
अरे इतना मत बोलिए राहुल जी! हमारे डंकापति किसी से डरते थोड़ी हैं! वो देश के लिए जीते हैं! अगर आपकी बात सही है तो उसमें भी वो देश के लिए ही कर रहे हैं! आप उनकी फिरकी लेना बंद कीजिए🙏🏻
“…नरेंद्र मोदी कहते हैं कि कांग्रेसी देशद्रोही है तो मैंने उनसे सीधा चैलेंज कहा मैंने कहा देखिए मोदी जी आप आ जाइए कहीं भी आ जाइए… जिसको जज बनाना है बना दो मोहन भागवत को जज बनाना है उसको बना दो, अदानी जी को जज बनाना है उसको बैठा दो, आपके सामने कोई फर्क नहीं पड़ता एनडीटीवी के स्टूडियो में डिबेट करानी है वहाँ करा दो…”
“…मैं आपको गारंटी दे रहा हूँ, पांच मिनट छह मिनट भी नहीं लगेंगे, साबित कर दूँगा कि नरेंद्र मोदी देशद्रोही है।…”
“…ट्रंप 24 घंटा मोदी के सामने बोलता है कि मैंने हिंदुस्तान और पाकिस्तान के युद्ध को रुकवाया। नरेंद्र मोदी चूं तक नहीं बोल पाता है।…”
“…यूएस डील के होने के बाद अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने अदानी का केस बंद करवा दिया। इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है?…”
~ @RahulGandhi
Maneesh Kothari retweeted
“…अमित शाह जी एक बात बताइए! अदानी के पोर्ट में, गुजरात में जो ड्रग्स पकड़े गए, उसके बारे में आपने क्या किया? जो हजारों किलो वहां पे ड्रग्स पकड़े गए, हेरोइन पकड़ा गया। उसके बारे में आपने क्या किया?…”
“…लॉ एंड ऑर्डर की आप बात करते हो, आपने तो मतलब जेल में गैंगस्टर पाल रखे हैं। पूरा देश जानता है कि अमित शाह ने अपने गैंगस्टर पाल रखे हैं।…”
“…आप नशे की बात मत कीजिए। आप लॉ एंड ऑर्डर की बात मत कीजिए। लॉ एंड ऑर्डर की बात करनी है तो देश को बताइए मणिपुर में क्या हो रहा है।…”
~ @RahulGandhi जी
अमरीका सीनेट के रिजल्ट बताते हैं कि @kharge जी की बात सच निकली, अब यह देखना बाकी है कि @RahulGandhi जी की बात कब सच निकलती है |
#बापू_तो_गयो
#बाप_भी_जाएगा
#USElections
Maneesh Kothari retweeted
Villagers in Pauri HELD BJP MLA Rajkumar Pori HOSTAGE in his car for 2 hours! A 4 yr old girl was KILLED by a leopard today. This isn't the first. A DOZEN ppl killed by leopards this yr. Where is Forest Dept? Whr is Double Engine? Sab so rahe hain! Shame on you.
Maneesh Kothari retweeted
03 Nov 1988 OP CACTUS MALDIVES Indian Armed Forces spearheaded by Para Bde /6 PARA executed mission impossible rescuing President of Maldives, Op launched with zero int from a cold start was accomplished within 16 H,without any casualties, SALUTE India’s military might.
Maneesh Kothari retweeted
Yes "military might".. REAL military might that was.
@Ptr6Vb was the BM (Brigade Major) of the 50 Para Bde.. He had assigned the task to 6 Para (his old coy), which had returned from CI Ops at Manipur earlier..
And then @ParaRjs, OC, Charlie Coy, got assigned to act as the Pathfinders and for running point..
They landed at Hulhule.. crossed over by boat and stormed the place..locating and securing the President of Maldives and his family..
Jai Hind..
indiasentinels.com/opinion/w…
दोस्ती क्या न करवाए… @aamirkahn78 ने मुझसे स्पेस में गाना आखिर गवा ही दिया 😄
God bless Space
Maneesh Kothari retweeted
It's a big big attack on Modi countering allegations of foreign help from BJP.
Mr Modi, stop lying to this nation.
You became PM because of foreign help. You remain PM because of foreign help.
Your financial system is fully controlled and supported by foreigners. Foreign social media fully backs you.
I challenge you to an open debate about this. Any stage, any time. Come if you have the guts.
You won't dare, because you are terrified of what I know about you.
मोदी जी, इस देश से झूठ बोलना बंद कीजिए।
आप विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने। और विदेशी मदद से ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं।
आपकी आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह विदेशियों के नियंत्रण में और समर्थन से है। विदेशी सोशल मीडिया पूरी तरह आपके साथ खड़ा है।
मैं आपको इस मुद्दे पर खुली बहस की चुनौती देता हूं। कोई भी मंच, किसी भी समय। हिम्मत है तो आइए।
आप नहीं आएंगे, क्योंकि जो मैं आपके बारे में जानता हूं आप उससे डरते हैं।
Maneesh Kothari retweeted
आप में से ज़्यादातर लोगों ने कल दिल्ली में मौजूद इस विशाल भीड़ की वीडियोज़ और तस्वीरें देखी होंगी, जिसे गोदी मीडिया और सत्ता पक्ष के लोगों ने लगातार नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की। लेकिन इस भीड़ को देखकर एक बार फिर वही सवाल उठाया जा रहा है कि अगर विपक्ष इतनी बड़ी भीड़ जुटा पाता है, तो वह चुनाव क्यों हार जाता है?
दरअसल, इस सवाल का जवाब भी इस भीड़ में हीं छुपा है।
दिल्ली की सड़कों से लेकर पुलों और मैदानों तक, दूर-दूर तक लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। इस भीड़ में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग शामिल थे। यह किसी एक प्रदेश, एक पार्टी या एक विचारधारा तक सीमित भीड़ नहीं थी, बल्कि अलग-अलग पृष्ठभूमि और क्षेत्रों से आए लोगों का विशाल जनसमूह था।
इनके यहाँ जमा होने की वजह भी साफ़ थी। ये लोग मौजूदा सरकार और उसकी व्यवस्थाओं से हताश, परेशान और नाराज़ हैं। इनके भीतर बदलाव की एक उम्मीद और चाह है, जो इन्हें दिल्ली तक खींच लाई।
अब ज़रा सोचिए, जब जनता सरकार से इतनी नाराज़ है कि वह सड़कों पर उतरकर उसके खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद कर रही है, जब लोग अपनी नाराज़गी अलग-अलग तरीकों से जाहिर कर रहे हैं, तो फिर चुनाव में यही जनता सत्ता में बैठे लोगों को दोबारा चुन कैसे लेती है?
अगर जनता सरकार से खुश नहीं है, अगर उसके भीतर इतना असंतोष है, अगर सड़कों पर विरोध की इतनी बड़ी तस्वीर दिखाई दे रही है, तो फिर सवाल उठता है कि चुनावी नतीजे सत्ता के पक्ष में कैसे आते हैं?
क्या जनता का यह असंतोष चुनावी नतीजों में दिखाई नहीं देना चाहिए? आखिर सरकार जीत कैसे रही है? क्या ये जीत जनता द्वारा दिए गए जनादेश को सही मायने में प्रतिबिंबित करती है?
या फिर यह सवाल उठना लाज़िमी नहीं है कि कहीं यह जीत वोट चोरी का नतीजा तो नहीं?
Maneesh Kothari retweeted
बताइये जो दिल्ली पुलिस कुछ दिन पहले तक प्रदर्शन करने वालों को पीट रही थी, घसीट रही थी, पीस बॉन्ड यानि प्रदर्शन न करने का मुचलका भरवा रही थी, वही दिल्ली पुलिस आज पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रही थी.
गज़ब चाणक्य गिरी है, भैया शाह जी की- पुलिस तक आंदोलन में उतर चुकी है !
इससे ज्यादा अमृत काल और क्या चाहिए- 12 साल से सत्ता में बैठी पार्टी - लोकतंत्र बचाओ - का जुलूस निकाल रही है और उसकी पुलिस धरना प्रदर्शन कर रही है !
भई दिल्ली पुलिस वालो समझ में आ गया कि जब अन्याय महसूस हो तो प्रदर्शन ही रास्ता है ! अगली बार प्रदर्शनकारियों को पीटने- घसीटने का हुक्म आए तो ये सबक याद रखना !
वीडियो सौजन्य : Shuaib Raza

















