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और चाहो तो मैं भूल जाऊँ उसे ,
पर उस शख़्स जैसा कोई मिला नहीं |
समय तो आगे बढ़ता गया ,
पर हम उन आँखों से निकले नहीं |
वो पहले सा वजूद अब कहाँ से लाएँ ,
जब मासूमियत अब पहले जैसी रही नहीं |
सीख लिया ये सबक ज़िंदगी का ,
मगर वो आशिक़ी की गलियाँ अभी भुला नही।।
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वो फिर से गलती करने लगा है ,
उनकी यादों में खोने लगा है |
हकीकत का सामना न हुआ उससे ,
ख़यालों में वक़्त बिताने लगा है |
वो दिल्लगी और आशिक़ी भूल न सका,
तस्वीरों में उसे निहारने लगा है |
और लोग कहते हैं बस भी कर अब ,
पर वो भीड़ में भी अकेला रहने लगा है |






