सरकार को सुप्रीम कोर्ट में एक लाइन में कहना था कि हमने सवर्ण समाज को प्रताड़ित करने वाले कानून को वापस लेने का फैसला किया है।चैप्टर क्लोज हो जाता।
सवर्णों को मारने वाले कानून को सरकार एक लाइन में मार सकती थी,सरकार ने उसे मारने के बजाय ज़िंदा रखने के हथकंडे अपनाए।
सरकार ने कुछ नहीं किया,सरकार को कुछ करना भी नहीं था।जो क़ानून सवर्णों को डसने के लिए बना था,उस क़ानून को कुचलने के बजाय सरकार ने उसे दूध पिला दिया।
सरकार ने साफ़ कहा कि सवर्ण कौन होते हैं क़ानून के सांप को जहरीला बताने वाले।सांप में जहर है या नहीं, यह हम कमेटी बनाकर पता करेंगे।सांप को सरकार ने जन्म दिया है।सरकार कैसे मान ले कि सांप जहरीला है।
सवर्णों का दम निकालने पर तुली सरकार ने दस महीने बाद कल सुप्रीम कोर्ट मे कमेटी बनाने का कहकर पल्ला झाड़ लिया।यूपी चुनाव तक सवर्णों को झुनझुना पकड़ा दिया।झुनझुने से मन बहलाते रहो।
सवर्ण समाज की सिसकिया सरकार ने नहीं सुनी।सरकार के सवर्ण समाज को प्रताड़ित करने की सुनियोजित साजिश में सवर्ण समाज ख़लल डाल रहा है।
सवर्ण समाज सरकार के सामने डटकर खड़ा है।दो दो हाथ सरकार से करने को तैयार है।सरकार को यह अच्छा नहीं लग रहा है।सवर्णों की बलि चढ़ा कर सरकार अमर होना चाहती है।सवर्णों के बल से बलवान हुई सरकार को लगता है कि अब सवर्णों की बलि चढ़ा देना चाहिए।सरकार को लगता है कि अब सवर्ण उसका बाल भी बांका नहीं कर सकते हैं।सरकार अपने राजनीतिक बल के लिए सवर्णों से छल करने को सहर्ष तैयार हैं।सरकार को उम्मीद नहीं थी कि सवर्ण माथे पर बल ला देंगे।बाहुबली सरकार के नसो में बल भी सवर्णों ने भरा है, लेकिन सरकार ने सवर्णों के साथ सियासत कर दी।
सवर्ण समाज सब देख रहा है और सरकार की हर चाल को समझ रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले 12 वर्षों से लोकतांत्रिक राजनीति के उस आला दायरे में रहे हैं, जहां कोई और नेता पहुँच नहीं पाया है।कोई भी संकट और चुनौती ब्रांड मोदी को भेद नहीं पाया है।
लंबे दौर में मोदी का राजनैतिक ग्राफ गुरुत्वाकर्षण के नियम से बेअसर है। @ShivaniGupta_5 के साथ चर्चा 👇
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कल बीजेपी के एक बेहद प्रभावशाली नेता के यहाँ जाना हुआ।एक नेता के साथ राजनीति को कवर करने वाले पत्रकार की मुलाक़ात होगी तो निश्चित रूप से राजनीति पर ही चर्चा होगी।हुआ भी वही।
बीजेपी पर,मोदी सरकार पर,मोदी सरकार में होने वाले विस्तार को लेकर,राहुल गांधी की राजनीति पर, एसआईआर पर,मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के भविष्य पर,देश के राजनीतिक परिदृश्य पर,यूपी चुनाव पर,संघ पर विचारों का आदान प्रदान हुआ।लेकिन सबसे लंबी चर्चा यूजीसी को लेकर हुई।यूजीसी पर सरकार के रूख को लेकर मैंने निराशा और नाराजगी व्यक्त की।मैंने नेता जी से पूछा कि बीजेपी ने इतना आत्मघाती कदम क्यो उठाया? केंद्र सरकार ने अभी तक ऐतिहासिक भूल सुधार क्यो नहीं की?
बीजेपी के वरिष्ठ नेता का जवाब चौकाने वाला था। नेता ने कहा कि “सरकार मन से मान रही है कि यूजीसी के मामले को लेकर गलती हुई है,सरकार भूल सुधार चाहती है लेकिन बीजेपी के एससी,एसटी और ओबीसी नेताओं के साथ सहयोगी दलों के नेताओं का भारी दबाव है,जिसके कारण केंद्र सरकार कदम पीछे खींचने का साहस नहीं जुटा पा रही है।बीजेपी के सहयोगी दलों में नेता ने ओम प्रकाश राजभर,संजय निषाद,अनुप्रिया पटेल के साथ अन्य नेताओं का जिक्र किया।
मैं हैरान और हतप्रभ था।मैंने नेता जी से कहा कि क्या अब राजभर,निषाद या अनुप्रिया पटेल या अन्य ओबीसी नेताओं का आप नाम ले रहे हो यह लोग अब सवर्णों के भविष्य का फैसला करेंगे? क्या सवर्ण समाज अब इन पिछड़ों की राजनीति करने वाले छोटे दलों के रहमो करम पर निर्भर है?
नेता ने कहा कि “यूपी चुनाव को देखते हुए ओबीसी वोट की चिंता बीजेपी कर रही हैं।मैंने पूछा कि “क्या बीजेपी के लिए ओबीसी वोट बैंक ही सबकुछ है।सवर्ण समाज की जरा भी चिंता नहीं है? नेता ने गोल मोल जवाब दिया।सीधा कहने से बच रहे थे।अपनी पार्टी को बचा रहे थे।
दरअसल पूरी बातचीत से मुझे समझ आया कि बीजेपी दो नावों पर पैर रख रही है।दोनों को साधने की कोशिश कर रही है।सवर्ण भी सधे और ओबीसी भी झोली में गिरे।बीजेपी की पहली प्राथमिकता एससी,एसटी और ओबीसी है,दूसरी प्राथमिकता सवर्ण है।मतलब एससी,एसटी और ओबीसी हर हाल में साधना है,भले ही सवर्ण हाथ से फिसल जाए।
क्या सवर्ण समाज शरणार्थी है? सवर्ण समाज को समझना होगा कि सत्ता ज़रूरी है कि समाज? सत्ता तो आती जाती रहेगी,समाज रहना चाहिए।जब समाज का मान सम्मान सब चला जाएगा तो ऐसी सत्ता लेकर क्या करेंगे? सवर्ण समाज की आने वाली पीढ़ी पूछेगी कि जब सवर्ण समाज को मुखर होकर विरोध दर्ज कराना था,तब समाज के लोगों ने चुनी हुई चुप्पी क्यों चुन ली? सवर्ण समाज सत्ता दिला सकता है तो सत्ता से बेदखल कर भी सकता है।सवर्ण समाज के धैर्य ने बीजेपी को सत्ता की धरोहर दी है।सवर्ण समाज धैर्य को धरकर बैठा है।धैर्य की परीक्षा ना ले।
सार्वजनिक मंचों और टीवी चैनलों के स्टूडियो में बहस के दौरान अपने वैचारिक विरोधियों से वैचारिक असहमति के बावजूद एक-दूसरे की बौद्धिक हैसियत और सार्वजनिक गरिमा का सम्मान क्यो नहीं किया जाता है?
किसी से असहमत होने के अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम अपने शब्दों के चयन में इतना गिर जाए कि हम अपने ही नजरों में और अपने करीबी लोगों के लिए शर्मिंदगी का सबब बन जाए।
आपकी बहस में आपका अनुभव, आपका अध्ययन आपके संस्कार के साथ विरोधियों से संवाद की उदारता का दर्शन होना चाहिए।आपकी बहस में आपका अनुभव बोलना चाहिए और विरोधियों पर व्यंग्य में राजनीतिक समझ झलकना चाहिए।
बहस और डिबेट के दौरान आप अपने राजनीतिक विरोधियों पर जितने चाहें आरोप लगाइए,तथ्य रखिए, सवाल कीजिए और भरसक विरोध कीजिए लेकिन विरोध की भी एक भाषा होती है, उस भाषा में तल्ख़ी हो सकती है, तंज हो सकता है, लेकिन अपमानित करना, बेहद आपत्तिजनक भाषा को बेहद बेशर्मी से बोलना, बोलते वक़्त चेहरे पर शिकन तक ना आना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
बहस में असहमति जितनी कठोर हो,भाषा में मनुष्य की गरिमा उतनी ही आवश्यक हो जाती है।कभी कभी बहस कड़वाहट से भर जाती है,लेकिन कड़वाहट इतनी भी ना हो कि वह मनुष्य की मर्यादा को लांघ जाए।
बहस में किसी के लिए अपमानसूचक शब्द को सामान्य क्यों बनाया जाए? राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को चोट पहुँचाने के लिए अपमानजनक शब्दों को हथियार क्यों बनाया जाए?
तलवार का घाव भर सकता है, ज़ुबान का घाव हमेशा हरा रहता है।किसी पत्रकार, किसी राजनीतिक विश्लेषक की ज़ुबान का घाव तो और भी गहरा होता है, क्योंकि उसे लाखों लोग सुनते हैं और फिर वही शब्द सार्वजनिक संस्कृति में उतरने लगते हैं।
भाषा केवल शब्दकोश नहीं होती; उसके पीछे पूरे व्यक्ति की स्मृति,मर्यादा और संवेदना चलती है।
किसी भी पत्रकार या पढ़े लिखे व्यक्ति जिसने लंबा सार्वजनिक जीवन देखा है,उससे विमर्श में अपेक्षा भी किसी सामान्य सोशल मीडिया ट्रोल वाली नहीं हो सकती।किसी अनुभवी पत्रकार या किसी बौद्धिक व्यक्ति की भाषा केवल उसकी निजी भाषा नहीं रहती; वह उसके व्यवसाय में आने वाले युवाओं के लिए अनुकरणीय भाषा बनने लगती है।
आदमी का परिचय उसके कपड़ों से कम,उसकी बोलने वाली बोली से अधिक होता है।
टीवी बहस के दौरान आप अपने वैचारिक विरोधियों से जमकर बहस करे,जमकर आरोप लगाए,लेकिन इतना ध्यान जरूर रखें कि बहस का स्तर केवल इस बात से तय नहीं होता कि आरोप क्या लगाए गए,इससे भी तय होता है कि बहस करते समय आपने आपकी भाषा कितनी सभ्य,मानवीय और गरिमापूर्ण बनाए रखी।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे।अखिलेश यादव का मानना है कि वह मुख्यमंत्री तभी बनते हैं जब चुनाव नहीं लड़ते हैं।
अखिलेश यादव का चुनाव न लड़ने का फैसला एक सोची-समझी रणनीति है।अखिलेश जानते हैं कि वह अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता और स्टार प्रचारक हैं। उनकी पार्टी उनके ऊपर पूरी तरह निर्भर है।उन्हें सभी 403 सीटों पर पार्टी का और सहयोगी दलों का प्रचार करना होगा।
अगर अखिलेश विधानसभा का चुनाव लड़ते तो भाजपा उनको उनकी सीट पर उलझाए रखने के लिए उनके सामने उनके किसी परिवार के सदस्य को या किसी हैवीवेट कैंडिडेट को उतार कर अखिलेश को उनकी ही विधानसभा सीट में घेर सकती थी।चुनाव ना लड़कर अखिलेश पूरा ध्यान पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की रणनीति को मजबूत करने और पूरे प्रदेश में पार्टी का माहौल बनाने पर देंगे।अखिलेश यादव कह सकते हैं कि वह एक सीट पर नहीं पूरे 403 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं।
यूपी में कौन कौन से मुख्यमंत्री पहले सीएम बने और बाद में विधायक बने।
त्रिभुवन नारायण सिंह उत्तर प्रदेश के इतिहास में ऐसे पहले मुख्यमंत्री थे जो सीएम की शपथ लेते समय विधायक नहीं थे।1970 में सीएम बनने के बाद त्रिभुवन नारायण सिंह ने गोरखपुर की मनीराम सीट पर विधानसभा उपचुनाव लड़ा और हार गए, जिसके बाद उनको इस्तीफा देना पड़ा था।
बसपा प्रमुख मायावती ने जब गेस्ट हाउस कांड के बाद भाजपा के समर्थन से 1995 में सीएम बनी तब मायावती विधायक नहीं थी। हालांकि मायावती की सरकार 4 महीने में ही गिर गई।
1999 में कल्याण सिंह को हटाकर जब भाजपा ने राम प्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया, तब वे भी किसी सदन के सदस्य नहीं थे।सीएम बनने के बाद वह विधान परिषद के सदस्य बने।इसके बाद जब साल 2000 में राजनाथ सिंह ने पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब वे भी विधायक नहीं थे।बाद में उन्होंने हैदरगढ़ विधानसभा सीट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा की सदस्यता हासिल की थी।
सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने 2003 में तीसरी बार जब मुख्यमंत्री की शपथ ली थी तब मुलायम संभल से लोकसभा सांसद थे।सीएम बनने के बाद मुलायम सिंह यादव ने गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव जीता था।
साल 2007 में जब बसपा को पूर्ण बहुमत मिला था तब भी मायावती विधायक नहीं थी।सीएम बनने के बाद वह एमएलसी बनीं।
साल 2012 में जब अखिलेश यादव ने यूपी के सबसे युवा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली,तब वे कन्नौज से लोकसभा सांसद थे।मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दिया और विधान परिषद के रास्ते सदन के सदस्य बने।
2017 के यूपी चुनाव में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार में जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने, तब योगी गोरखपुर से लोकसभा सांसद थे।मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने विधान परिषद की सदस्यता ग्रहण की थी, हालांकि साल 2022 के विधानसभा चुनाव में योगी ने गोरखपुर शहरी सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा और विधायक बनकर सीएम बने थे।
2027 के इस यूपी विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि विधानसभा चुनाव लड़कर विधायक बनने वाला कोई सीएम बनता है या बिना विधानसभा चुनाव लड़े कोई नेता सीएम बनता है।
यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी के अपने आंतरिक सर्वे में यूजीसी के कारण भारी नुकसान होने का अंदेशा व्यक्त किया गया है।गौरतलब है कि एमएलसी चुनाव में बीजेपी के ख़राब प्रदर्शन और एमएलसी की पांचों स्नातक सीटों पर समाजवादी पार्टी को बीजेपी से 36,857 वोट ज़्यादा मिलने के लिए यूपी बीजेपी ने यूजीसी को जिमेदार ठहराया है।
बीजेपी का संकट इसलिए भी बढ़ा है क्योंकि विधान परिषद चुनाव में ऐसे हजारों मतपत्र मिले हैं जिसमे पोस्टल बैलेट पर भाजपा उम्मीदवारों को वोट देने के बजाय उनके नाम के आगे 'UGC Roll Back' लिखकर बैलेट बॉक्स में डाल दिए गए थे।
सवर्णों को और उसमे भी खासकर ब्राह्मणों को अपने खूंटे से बंधा मान कर चल रही बीजेपी को अब समझ में आ रहा है कि नाराज सवर्ण समाज बीजेपी का यूपी में जमा जमाया खूंटा उखाड़ सकता है।
खबर है कि संघ ने यूपी चुनाव से पहले यूजीसी पर केंद्र सरकार को फैसला लेने के लिए कहा है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यूजीसी सर्कुलर को 'असंतुलित' बताना और 'सामाजिक एकता' के लिए खतरा मानते हुए सख्त कदम उठाने के लिए सरकार को सलाह देना जमीनी स्तर पर बीजेपी को हो रहे नुक़सान को बता रहा है।
30-31 अक्टूबर को लखनऊ में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भी बीजेपी को यही फ़ीड बैक मिला है कि सवर्ण समाज बीजेपी को सबक़ सीखने की तैयारी कर रहा है।इसी बैठक के बाद 1 नवंबर को प्रयागराज में सवर्ण-ब्राह्मण सम्मेलन में यूजीसी के मुद्दे पर मुख्य अतिथि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को ब्राह्मणों की नाराजगी का सामना करना पड़ा था।
बीजेपी के एक बड़े नेता का कहना है कि केंद्र सरकार यूजीसी को लेकर तीन विकल्पों पर विचार कर रही है। पहला विचार यह है कि केंद्र सरकार अपने स्तर पर यूजीसी के इस विवादित सर्कुलर को वापस लेने का आदेश जारी कर दे, दूसरा विकल्प यह है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार नए नियमों को व्यावहारिक रूप से कठिन मानकर निरस्त होने दे और तीसरा विकल्प यह है कि सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी पैरवी के जरिए पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू कराया जाए। जिससे अगड़ा, पिछड़ा और दलित वर्ग तीनों के हित संतुलित रह सकें।
सरकार यूपी चुनाव से पहले कौन सा विकल्प अपनाती हैं, यह देखना बाकी है।
केंद्र सरकार यूजीसी के विवादित सर्कुलर को वापस लेने का मन बना चुकी है।
सवर्णों को दोयम दर्जे का नागरिक मान रही केंद्र सरकार को अब समझ में आ गया है कि सवर्ण समाज को पूरा सम्मान देना होगा।
सोया हुआ सवर्ण समाज अब जाग गया है।सवर्ण समाज किसी के दरवाजे से बंधा हुआ बैल नहीं है।सवर्ण अब सहन नहीं करेगा।
पंजाब में आम आदमी पार्टी के 40 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी होने के बाद बची सीटों पर असर दिखने लगा है।जिनका टिकट कटना तय था,उनका पार्टी छोड़ना शुरू हो गया है।
आम आदमी पार्टी पंजाब में पटियाला के समाना से विधायक चेतन सिंह जौड़ामाजरा और सनौर से विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा ने पार्टी छोड़ दी है।दोनों पार्टी में नाम मात्र के लिए थे।दोनों का विवादों से नाता रहा है और टिकट कटना तय था।
जौड़ामाजरा आप सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे हैं और विवादों के चलते उन्हें हटा दिया गया था।जौड़ामाजरा से स्वास्थ्य मंत्रालय वापस लिए जाने के बाद आप पार्टी ने अकाली दल से आए वरिष्ठ नेता सुरजीत सिंह रखड़ा को हलका इंचार्ज बनाकर साफ कर दिया था कि जौड़ामाजरा को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलेगा। 2022 के विधानसभा चुनाव में जौड़ामाजरा ने अकाली दल के सुरजीत सिंह रखड़ा को 40 हजार वोटों से हराया था।सुरजीत सिंह रखड़ा अब आप पार्टी में हैं और उनको टिकट मिलना तय था,ऐसे में आप विधायक जौड़ामाजरा का जाना भी तय था।
आप पार्टी छोड़ने वाले दूसरे विधायक हरमीत सिंह पठानमाजरा पर सितंबर 2025 में दुष्कर्म,धोखाधड़ी और धमकी का मामला दर्ज किया गया था।फरवरी-मई 2026 में उन्हें भगोड़ा घोषित किया गया था।वे ऑस्ट्रेलिया फरार हो गए थे।जांच में शामिल होने के लिए लौटने पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।
दोनों विधायक बीजेपी में शामिल होकर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
खबर है कि बीजेपी ने पहले आप पार्टी में रहे और अब बीजेपी के पाले में आ चुके राज्यसभा सांसद संदीप पाठक को आप विधायकों और संगठन के नेताओं को तोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी है।बीजेपी 15 सीटों पर आप पार्टी के नेताओं को लाकर चुनाव लड़ाने की रणनीति पर काम कर रही है ।
आने वाले दिनों में आप पार्टी के कई और विधायक बीजेपी में जा सकते हैं।
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This week will see Congress’ Punjab campaign launch. @JainendraKumar takes us inside their strategy. @akhileshsharma1 breaks story on when the BJP-Akali alliance will be announced and @semeerc has dope on Mahayuti rumble. Cockroaches, Rehaan Vadra and much more with @bhupendrachaube in this episode of #PoliticsZindabad
Watch: youtu.be/zT08aRz7yyY
पंजाब विधानसभा चुनाव से करीब 4 महीने पहले आम आदमी पार्टी ने 40 सीटों पर उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर विपक्षियों के उस नैरेटिव को मात देने की कोशिश की है, जिसमें कहा जा रहा था कि अपराध और नशे के मुद्दे पर सरकार बैकफुट पर आ गई है।आप पार्टी पहली सूची में कोई क्रांतिकारी बदलाव करने से बची है।सभी 40 उम्मीदवार मौजूदा विधायक हैं। जिनका तय था,उनको फिर से टिकट दिया गया है।पहली सूची में ऐसे कई नाम हैं जिनका दूसरी पार्टियों में जाने की सबसे ज्यादा चर्चा चल रही थी,उनको टिकट देकर रोकने की कोशिश की है।
आम आदमी पार्टी के चुनावी मैनेजमेंट की असली परीक्षा बचे हुए 77 सीटों पर प्रत्याशियों का फैसला करते समय होगी। 40 विधायकों को टिकट देने के बाद अभी आप पार्टी के 54 मौजूदा विधायकों के टिकट का फैसला होना बाकी है।यह देखना दिलचस्प होगा कि आप पार्टी जिन विधायकों के टिकट काटेगी, वह क्या करेंगे।पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता बने रहेंगे या फिर किसी और पार्टी में शामिल होंगे।पार्टी के सामने विधायकों के टिकट कटने पर बग़ावत से रोकने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
बची सीटों पर नए चेहरों, दूसरे दलों से आए नेताओं व संगठन के पदाधिकारियों को कितना मौका मिलता है. यह चुनावी रणनीति की असली दिशा बताएगा।
पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार रहे और बाद में बीजेपी में शामिल हो चुके संदीप पाठक और राघव चड्ढा पूरी कोशिश करेंगे कि आप पार्टी के टिकट से वंचित विधायकों को बीजेपी में शामिल कर आम आदमी पार्टी को झटका दिया जाए।
अपनी पार्टी को टूट से बचाने की बड़ी चुनौती अरविंद केजरीवाल और सीएम भगवंत मान के सामने होगी।यही कारण है कि आप पार्टी ने मान कैबिनेट में अब तक पांच मंत्रियों कुलदीप धालीवाल, बहाशंकर जिंपा, डॉ. इंदरबीर सिंह निखार और बलकार सिंह को ख़राब प्रदर्शन के बाद कैबिनेट से हटाया गया था, लेकिन इन चारों को पार्टी ने फिर उम्मीदवार बनाया है।वहीं, जेल में बंद संजीव अरोड़ा के विभाग वापस लिए जाने के बावजूद उनका कैबिनेट मंत्री का दर्जा बरकरार है और टिकट भी दिया है।
पहली सूची में चार महिलाओं को जगह मिली है।इनमें नकोदर से इंदरजीत कौर मान, बलाचौर से संतोष कटारिया, मोगा से डॉ. अमनदीप कौर अरोड़ा और तलवंडी साबो से बलजिंदर कौर शामिल हैं।40 उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10% है।
आम आदमी पार्टी की 40 उम्मीदवारों की सूची में चार विधायक ऐसे हैं, जिन्होंने 2017 और 2022 दोनों विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की थी।ये 2027 में तीसरी बार चुनाव लड़ेंगे।इनमें कोटकपूरा से कुलतार सिंह संधवां, तलवंडी साबो से बलजिंदर कौर, गढ़शंकर से जय कृष्ण सिंह रोड़ी और निहाल सिंह वाला से मनजीत सिंह बिलासपुर शामिल हैं।
आप पार्टी की पहली सूची में 33 ऐसे विधायक हैं, जिन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जीत दर्ज की थी।अब ये दूसरी बार चुनाव लड़ेंगे।इनमें मुख्यमंत्री भगवंत मान भी शामिल हैं।उन्होंने 2017 में जलालाबाद से चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए थे।2022 में धूरी से पहली बार विधायक बने।
पहली बार उपचुनाव जीतने वाले 3 विधायकों को भी दूसरा मौका दिया गया है।इनमें चब्बेवाल से डॉ. ईशांक कुमार चब्बेवाल लुधियाना पश्चिम से संजीव अरोड़ा और तरनतारन से हरमीत संधू शामिल हैं।
आप की पहली सूची में माझा, दोआबा और मालवा को प्रतिनिधित्व मिला है।मालवा क्षेत्र से सबसे ज्यादा 27 जबकि दोआबा से 8 और माझा से 5 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए गए हैं।
#Electionanalysisbysameer
Zee news की लाइव डिबेट में लेफ्ट नेता विवेक श्रीवास्तव ने मुझे जान से मारने की धमकी दी। बीजेपी प्रवक्ता @pradip103 ने इसका पुरजोर विरोध किया। @ZeeNews @pratyushkkhare
देश में नक्सलवाद को पोषित करने वाले और हिंसा की राजनीति करने वालो से यही उम्मीद की जा सकती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ प्रचारक से एमएलसी चुनाव पर बात हुई।यूपी में बीजेपी के प्रदर्शन पर उन्हें कतई आश्चर्य नहीं हुआ।उल्टे उन्हें इस बात का आश्चर्य था कि गोरखपुर कैसे जीत गए।
यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर उनका कहना था कि विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर ली गई है।इंदौर में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी मंडल की बैठक में यूपी में बीजेपी की जमीनी हकीकत की जानकारी दी जाएगी।
संघ के प्रचारक ने एक बहुत गंभीर बात कही कि “जमीन पर संघ काम करे और बीजेपी का संगठन सिर्फ कमाई करे,यह ठीक नहीं है।अब ऐसा नहीं चलेगा। बीजेपी संगठन को भी उतना ही पसीना बहाना होगा, जितना संघ बहाता है।
आज सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है।
सरदार पटेल महात्मा गांधी के सबसे मजबूत सिपाही और अत्यंत भरोसेमंद सहयोगी थे।
महात्मा गांधी को वल्लभभाई पटेल की शक्ति, संकल्प और दृढ़ता का पूरा आभास था।महात्मा गांधी सरदार पटेल पर कितना भरोसा करते थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब आगा खाँ पैलेस में महादेव भाई की मृत्यु हुई,तब गांधी दुखी,नितान्त अकेले और असहाय थे।महादेव की अन्त्येष्टि कैसे हो ?कोई गांधी के पास नहीं था।गांधी ने तब ब्रिटिश सरकार से अनुरोध किया था कि उनके पास पटेल को भेज दें।गांधी को अगाध विश्वास था कि सरदार पटेल के आने से सब समुचित ढंग से हो जाएगा।गांधी सोच रहे थे कि पटेल पूना में ही यरवदा जेल में बन्द हैं।पर पटेल अहमदनगर में बंद थे।सरदार पटेल को ब्रिटिश सरकार ने नहीं भेजा।
पटेल और गांधी के अत्यन्त आत्मीय,मार्मिक व गहनतम प्रसंग महादेव भाई की यरवदा जेल की डायरी में उल्लिखित हैं जब लगभग 16 महीने वे तीनों जेल में साथ रहे थे।
लेकिन महात्मा गांधी के इस लौह पुरुष पटेल ने गांधी की हत्या के बाद जीवन जीने की इच्छा छोड़ दी थी।सरदार पटेल के सीने पर यह बोझ हमेशा लदा रहा कि उनके होते हुए उनके बापू की हत्या हुई।सरदार पटेल के अत्यन्त निकट के लोग गांधी की हत्या के बाद पटेल के जीवन में पैदा हुए शून्य एकाकीपन और दुख को महसूस कर रहे थे।पटेल का हँसना बन्द हो गया था।आँखों में विषाद, अकेलापन झलकता था।आयु से अचानक ज्यादा बूढ़े दिखने लगे थे।महादेव भाई ने अपनी डायरी में लिखा है कि सरदार ने 'बापूजी' से कहा था 'आपके बाद मेरी जीने की कोई इच्छा नहीं है।मैं प्रार्थना करता हूँ कि हम साथ मरें।' महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद सरदार पटेल ने गांधी के बारे में बात करना बहुत कम कर दिया था।
सरदार पटेल गांधी से सात साल छोटे और नेहरू से चौदह साल बड़े थे।गांधी की मृत्यु के बाद पटेल कांग्रेस और नेहरू दोनों के लिए,गांधी के स्थानापन्न संरक्षक की तरह हो गए थे।
गांधी की मृत्यु के बाद पटेल अपने निकटतम मित्रों के बीच हमेशा कहने लगे थे कि मुझे मरते दम तक नेहरू के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहना है।
गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने देश को धर्मनिरपेक्ष संविधान और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में गढ़ने में पूरा सहयोग दिया।संविधान निर्माण में पटेल ने मुसलमानों के तुष्टीकरण,वामपंथियों के उग्र पूँजीवादी विरोध,हिन्दू संगठनों के हिन्दू राष्ट्र को कभी कोई समर्थन नहीं दिया।पूरी स्पष्टता,निर्भीकता, दृढ़ता और तेजस्विता के साथ वह अपना पक्ष रखते रहे।
पटेल ने 'हिन्दू भारत' नहीं लोकतांत्रिक भारत के निर्माण में हिस्सेदारी की,उसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभायी।गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया।संघ को संविधान बनाने के लिए मजबूर किया और उसके बाद ही संघ से प्रतिबंध हटाया।पटेल ने इसे महात्मा गांधी को दी जाने वाली सच्ची श्रद्धाजंलि कहा था और शायद देश की जनता व लोकतंत्र के समक्ष गांधी की हत्या रोकने में असफल रहने का अपना शायद सबसे बड़ा प्रायश्चित्त भी माना था।
स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के इस योद्धा को जयंती पर नमन 🙏
यूपी एमएलसी चुनाव परिणाम बीजेपी के लिए आने वाले संकट की आहट है।सच यही है कि सपा भारी पड़ी है।
एमएलसी चुनाव में सपा ने 2 सीटों पर बढ़त बनाकर यह संदेश दे दिया है कि 120 दिनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए केक वॉक नहीं होंगे।नतीजे बता रहे हैं कि पढ़े लिखे तबके ने भले ही भाजपा को नकारा नहीं हो,लेकिन सपा को स्वीकारा जरूर है।सपा ने भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्र वाराणसी, आगरा और प्रयागराज में बढ़त बनाकर भाजपा को अपनी रणनीति का ताना बाना फिर से बुनने के लिए मजबूर कर दिया है।बक़ौल केशव प्रसाद मौर्य
“सपा उन जगह पर जीत गई,जहां उन्हें नहीं जीतना था”।
दरअसल मोदी और योगी के नाम पर निर्भर बीजेपी ने ग़लत टिकट दे दिए और हार को ख़ुद आमंत्रित किया।
आगरा शिक्षक सीट से आकाश अग्रवाल ने पहले भाजपा से टिकट माँगा था,नहीं मिला तो आकाश अग्रवाल सपा में शामिल हो गए और जीत गए।
मोदी के वाराणसी स्नातक सीट पर सब कह रहे थे कि सपा के आशुतोष सिन्हा के सामने भाजपा के केदारनाथ सिंह टिक नहीं पाएंगे, वाराणसी शिक्षक सीट पर भी सपा के शिक्षक राजनीति के दिग्गज लाल बिहारी यादव के सामने भाजपा ने प्रमोद मिश्रा टिक नहीं पाएंगे,लेकिन बीजेपी को वाराणसी में मोदी के नाम पर भरोसा था,बीजेपी वाराणसी में दोनों हारी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा को पूर्वांचल के इसी बेल्ट सबसे अधिक सीटें मिली थीं।मतलब साफ़ है कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के बाद कोई सुधार नहीं किया।
सीएम योगी के घर गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर बीजेपी इसलिए बाल बाल बची क्योंकि यादव मतदाताओं ने निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव को वोट दिया,सपा के संजयन त्रिपाठी को को नहीं।अगर अखिलेश यादव गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर अपने घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव का टिकट काटकर संजयन त्रिपाठी को नहीं देते और संजयन त्रिपाठी को निर्दलीय खड़ा करवा देते तो बीजेपी सीएम योगी के घर गोरखपुर-फैजाबाद सीट भी हारती।
लखनऊ स्नातक सीट पर कुर्मी वोटर बीजेपी से बुरी तरह टूटा है।लखनऊ स्नातक सीट पर कुर्मी चेहरों की भिड़ंत में सपा की कांति सिंह बीजेपी के अवनीश सिंह पटेल पर भारी पड़ी।प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव ने ख़ुद पूरी ताक़त झोंक दी लेकिन कुर्मी समाज ने सपा की कांति सिंह का साथ दिया।कांति सिंह सपा के प्रतापगढ़ से सांसद शिवपाल सिंह पटेल की पत्नी हैं।कांति दूसरी बार एमएलसी बनी हैं। वह 2014 में सपा के टिकट पर लखनऊ स्नातक सीट से ही एमएलसी का चुनाव जीती थीं।2020 में भाजपा ने सपा से ये सीट छीन ली थी।
समाजवादी पार्टी इस बार एमएलसी चुनाव में पश्चिमी यूपी में बुरी तरह हारी है।पश्चिमी यूपी में कुल पांच सीटें थीं।इसमें सिर्फ आगरा की स्नातक सीट पर सपा ने कब्जा किया,जबकि बाकी चार सीटों पर भाजपा ने अपना कब्जा बरकरार रखा।
यह कहा जा सकता है कि सीटों के लिहाज से भाजपा बड़ी पार्टी बनी है लेकिन वोट शेयर में सपा ने बाजी मारी है।
चुनाव में कुल 14 लाख 81 हजार 310 वोटर थे।
भाजपा को कुल 2 लाख 61 हजार 379 वोट मिले हैं।
सपा को कुल 2 लाख 64 हजार 502 मत मिले।
सपा को भाजपा से 3,123 वोट (करीब 0.45%) ज्यादा मिले हैं।
सवर्णों की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ी है।पिछड़ों ने भी बीजेपी से दूरी बनाकर रखी है।सवर्णों और पिछड़ों दोनों को साधने के चक्कर में दोनों बीजेपी से दूर हुए हैं।
मतलब दुविधा में दोनों गए,माया मिली ना राम।
उत्तर प्रदेश,बिहार,महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 सीटों पर हुए विधान परिषद चुनाव की तस्वीर लगभग साफ़ हो चुकी है।इन चार राज्यों में से तीन में बीजेपी और एक कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है।
कांग्रेस को उत्तर प्रदेश से कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए सपा को समर्थन देना कांग्रेस की मजबूरी थी।बिहार में ज़रूर आरजेडी से गठबंधन नहीं होने पर बिहार विधान परिषद की 8 सीटों में से कांग्रेस ने 5 सीटों पर अपने आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किए थे, लेकिन सभी सीटों पर कांग्रेस हार गई।
कांग्रेस के लिए सबसे बुरी खबर कर्नाटक से आई, जहां कांग्रेस सभी चारों सीटों पर हार गई।कर्नाटक में डीके शिवकुमार जैसे रणनीतिकार के सीएम रहते कांग्रेस से ऐसे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी।महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया।
महाराष्ट्र विधान परिषद की 5 सीटों पर हुए चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाविकास आघाड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 3 स्नातक सीटों पर कब्ज़ा जमाया है, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को सिर्फ़ 2 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
कांग्रेस ने संघ मुख्यालय,सीएम देवेंद्र फड़नवीस और नितिन गडकरी के गढ़ नागपुर में बीजेपी को चारों खाने चित कर दिया।नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने लगातार दूसरी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।
कांग्रेस ने जो तगड़ा झटका बीजेपी को नागपुर में दिया, वही तगड़ा झटका समाजवादी पार्टी ने बीजेपी को मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में दिया।काशी में सपा के लाल बिहारी यादव ने 2020 में जहां महज 936 वोटों से जीत दर्ज की थी, वही इस बार भाजपा पर 5015 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की।काशी स्नातक सीट पर सपा प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा भी जीत के दरवाजे पर खड़े हैं।
गोरखपुर में गोली योगी के कान को छूकर निकल गई,मतलब अपने घर में योगी हारते हारते बचे।गोरखपुर में भाजपा बेहद कड़े मुकाबले में सिर्फ 307 वोटों से जीत पाई।
सपा ने काशी में बीजेपी की चमड़ी उधेड़ दी है।गोरखपुर में अर्धनग्न अवस्था में बीजेपी को चौराहे पर खड़ा कर दिया है,और नागपुर में कांग्रेस ने बीजेपी की सरेराह इज्जत लूट ली।
कांग्रेस को इन चुनावों में खोने को कुछ नहीं था। कांग्रेस से कोई उम्मीद नहीं थी,निराश उन्होंने किया है जिनसे दुनियाभर की उम्मीद थी।
उत्तर प्रदेश चुनाव की पूर्व संध्या पर बीजेपी का यह प्रदर्शन बीजेपी के लिए चिंता लेकर आया है।कांग्रेस की हार पर हंसने वाले अंदर से बुरी तरह घायल हैं।
ख़ुद का घाव लाइलाज बने उसके पहले उसका इलाज कीजिए हुज़ूर।
Ramayan Special |
नई रामायण बनाना आसान है, लेकिन क्या रामानंद सागर वाली रामायण का जादू दोहराया जा सकता है?
वह कौन-सी बात थी, जिसने एक टीवी सीरियल को करोड़ों लोगों की आस्था और यादों का हिस्सा बना दिया?
रामानंद सागर के बेटे और फ़िल्ममेकर मोती सागर से सीधी बातचीत—उस रामायण के बनने की कहानी, उसकी अमिट छाप और सागर फ़िल्म्स के नए प्रोजेक्ट ‘श्रीमद् भागवतम’ तक का सफ़र।
देखिए यह ख़ास बातचीत।@MinakshiKandwal
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हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब नेताओं के साथ किसी संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति ने माना कि सत्ता और जवाबदेही एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, इसलिए पद छोड़ना ही उचित है।
इसका सबसे चर्चित उदाहरण लाल बहादुर शास्त्री हैं।1956 में महबूबनगर रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफे की पेशकश की थी,लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा न करने के लिए राजी कर लिया।लेकिन उसी वर्ष बाद में अरियालुर रेल दुर्घटना के बाद शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया।दुर्घटना के लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं थे, फिर भी उनका मानना था कि मंत्रालय के प्रमुख होने के नाते इस विफलता की नैतिक जिम्मेदारी उन्हें ही लेनी चाहिए।उनका त्यागपत्र राजनीतिक शुचिता के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है।
किसी भी संस्था के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि उसके पद पर रहते उस संस्था का सम्मान बना रहना चाहिए।शीर्ष पर बैठा व्यक्ति अपने विभाग के कामकाज की जिम्मेदारी से स्वयं को अलग नहीं कर सकता है।किसी महत्वपूर्ण संस्था के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति संस्थागत विफलता के परिणामों से अनिश्चित काल तक स्वयं को अलग नहीं रख सकता।रखना भी नहीं चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पद जितना ऊंचा होता है, उसके साथ जुड़ी जवाबदेही भी उतनी ही अधिक होती है।संवैधानिक संस्थाओं को प्रश्नों से परे होना ही होगा।
यह देश किसी राजनीतिक दल के बदौलत नहीं है।देश का लोकतंत्र किसी राजनीतिक दल की खूंटी से बंधा नहीं है।यह देश किसी नेता के रहमो करम पर नहीं है। देश का लोकतंत्र संवैधानिक संस्थाओं के दम ख़म, उनकी नैतिकता और उनकी निष्पक्षता पर टिका है।
यह धारणा कि जब तक कोई अदालत, जांच एजेंसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की व्यक्तिगत जवाबदेही स्थापित न कर दे, तब तक उसे पद पर बने रहना चाहिए।ऐसा हर संस्था पर लागू नहीं होता है।
लोकतंत्र इससे कहीं अधिक की अपेक्षा करता है।यदि कोई व्यवस्था विफल हो जाए,या उसका कामकाज संदेह के घेरे में आ जाए तो उस संस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को स्वयं से भी पूछना चाहिए कि क्या उसके पद पर रहने से व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास मजबूत हुआ है या कमजोर?
सार्वजनिक पद जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं होते; बल्कि जवाबदेही का अस्तित्व ही सार्वजनिक पदों के कारण है।
देश की जनता किसी भी संवैधानिक संस्था के शीर्ष पद पर काबिज व्यक्ति से उच्चतम नैतिकता का पालन करने की उम्मीद करती है।सर्वोच्च पद सर्वोच्च अहंकार का प्रतीक नहीं होता।
बिहार,उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र और कर्नाटक की कुल 28 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव के आज परिणाम घोषित होंगे।
सबसे ज्यादा 11 सीटें यूपी,बिहार में 8, महाराष्ट्र में 5 और कर्नाटक में 4 सीटों पर चुनाव हुए हैं।
यूपी की बात करें तो इस बार विधानसभा चुनाव से पहले माहौल बनाने के लिए सपा और बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।योगी की प्रतिष्ठा वाराणसी की शिक्षक और स्नातक और गोरखपुर-फैजाबाद सीट से जुड़ गई है।
2020 के चुनाव में वाराणसी की शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर सपा जीती थीं।पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र की सीटें हारने से भाजपा की बहुत किरकिरी हुई थी।गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर भाजपा से टिकट न मिलने पर डॉ. संजयन त्रिपाठी बागी हो गए और सपा के टिकट पर मैदान में है।इसके अलावा भाजपा के एक अन्य नेता अजय सिंह भी टिकट न मिलने से नाराज होकर निर्दलीय मैदान में उतर गए। रही-सही कसर इसी इलाके में स्नातक कोटे से भाजपा एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने पूरी कर दी। पार्टी के एक कार्यक्रम में मंच पर न बैठाए जाने से नाराज होकर भाजपा के अपने प्रत्याशी ध्रुव त्रिपाठी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।इस वजह से गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन सीट पर मुकाबला 'अपनों की बगावत बनाम पार्टी कैडर' का बन गया।
गोरखपुर और वाराणसी केवल सीटें नहीं हैं, बल्कि यह सीएम योगी का 'किला' और पीएम मोदी का 'काशी मॉडल' है।इसी वजह से इन सीटों पर दोनों दलों के लिए यह चुनाव करो या मरो की लड़ाई बन गया।
दरअसल स्नातक वोटर को समाज का सबसे जागरूक और ओपिनियन मेकर वर्ग माना जाता है। 2027 के आम चुनाव से ठीक पहले इस वर्ग का वोटिंग पैटर्न यह दिखाएगा कि प्रदेश का यह तबका किस राजनीतिक धारा के साथ बह रहा है।
एमएलसी चुनाव के परिणाम 2027 की राजनीतिक दिशा और हवा का रुख कुछ हद तक बता देंगे।
बिहार की बात करे तो बिहार में एमएलसी की 8 सीटों में से जेडीयू का सिर्फ पटना स्नातक सीट पर कब्जा है।जेडीयू 4 सीटों पटना, तिरहुत स्नातक और सारण, दरभंगा शिक्षक सीट पर चुनाव लड़ी है।
इस चुनाव की कमान नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने संभाल रखी थी।निशांत कुमार के 8 मार्च को पार्टी में शामिल होने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है। निशांत और संजय झा ने जमकर प्रचार किया। लल्लन सिंह प्रचार से दूर रहे।
अगर जेडीयू ने पिछली बार से अच्छा प्रदर्शन किया तो निशांत और संजय झा का पार्टी में प्रभाव बढ़ जाएगा।जेडीयू से बगावत करने वाले बाहुबली विधायक अनंत सिंह की ताक़त का भी पता चल जाएगा।जेडीयू ने अनंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया है।
प्रशांत किशोर की जनसुराज पहली बार विधान परिषद का चुनाव लड़ रही है।अगर इस चुनाव में प्रशांत किशोर जीत जाते हैं तो बांकीपुर के बाद यह दूसरी धमाकेदार जीत प्रशांत किशोर के जनसुराज की होगी।
महाराष्ट्र में तीन स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए चुनाव हुए हैं।ये निर्वाचन क्षेत्र हैं- पुणे संभाग स्नातक, नागपुर संभाग स्नातक, पुणे संभाग शिक्षक, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्नातक और अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र। महाराष्ट्र में बीजेपी- शिवसेना गठबंधन को कोई चुनौती नहीं है।
यूपी विधानसभा चुनाव में अमित शाह की बहुप्रतिक्षित एंट्री होने जा रही है।अमित शाह 30-31 अक्टूबर को लखनऊ आ रहे हैं।
2014 में मोदी के पीएम और अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद से लगभग सभी राज्य विधानसभा चुनाव में मोदी चेहरा और संगठन की कमान अमित शाह के हाथ में रही है।टिकट दिल्ली तय करता रहा है।
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में योगी कहीं नहीं थे, 2022 के यूपी चुनाव में योगी थे, लेकिन कमान मोदी और शाह के हाथ में थी।लेकिन 10 साल के शासन के बाद योगी यूपी में पूरी खुली छूट चाहते है।टिकट वितरण में फ्री हैंड चाहते है। दिल्ली का नेतृत्व कितना योगी को खुला छोड़ता है और कितना बांध कर रखता है,यह अमित शाह के यूपी दौरे और आने वाले दिनों में तय होगा।
यूपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी योगी की पसंद नहीं है।सरकार में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य योगी की पसंद नहीं है, यूपी सरकार और संगठन में मोदी और शाह का दखल रहा है।अब टिकट बंटवारे में केंद्र का कितना और योगी का कितना दखल होगा यह आने वाला समय बताएगा।
योगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमित शाह से सामंजस्य बैठाने की होगी।अमित शाह भी जानते हैं कि योगी अब 2017 वाले योगी नहीं हैं।भले ही बीजेपी योगी को सीएम फेस घोषित ना करे,लेकिन चुनाव का चेहरा योगी ही होंगे।
योगी और शाह दोनों बीजेपी की बहुमूल्य खोज है। दोनों मिलकर एक और एक ग्यारह है।

