आम आदमी पार्टी की पंजाब चुनाव के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट आने के बाद दो विधायकों ने पार्टी छोड़ी!
ये हैडलाइन है कुछ अखबारों की!
इसे पढ़कर क्या समझा जाये? यही न कि इनको टिकट मिला, पर इन्होंने पार्टी की उम्मीदवारी पर लात मार दी!
पर इन दोनों का तो 40 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में नाम ही नहीं था, फ़िर पार्टी छोड़ने के इनके डिसीज़न का लिस्ट से क्या लेना?
हाँ, आगे पढ़कर ये ज़रूर समझ में आया कि इनमें से एक AAP सरकार में मंत्री रह चुके हैं, जहाँ से इन्हें दो साल पहले हटा दिया गया था!
और दूसरे महानुभाव बलात्कार के मामले में जेल हो कर आए हैं!
तो बहुत संभव है कि इस “योग्यता” के चलते इन्हें AAP के उम्मीदवारों की किसी भी लिस्ट में जगह न मिलती!
लिहाज़ा इन्होंने पहले ही आम आदमी पार्टी छोड़ने का “क्रांतिकारी” ऐलान कर दिया!
और प्रधानमंत्री मोदी के दिखाए हुए रास्ते- आपदा में अवसर- पर चलते हुए ये बीजेपी की चौखट पर पहुँच गए!
आख़िर इनकी “योग्यता” की असली क़दर बीजेपी के अलावा और कहाँ हो सकती है?
ख़ैर, ये तो रही इन सूरमाओं की बात, पर लगता है अख़बारों के एडिटर्स कल छुट्टी पर थे इसलिए हैडलाइन ढंग से एडिट नहीं हो सकी!
या हो सकता है ऐसी हैडलाइन के ज़रिए भ्रम फैलाना ही कुछ अख़बारों का मक़सद हो…
न चुनाव आयोग का सॉफ़्टवेयर जातिवादी है और न ही यूपी के मुख्य निर्वाचन आयुक्त!
ये खेल कुछ और है!
दरअसल इतने एडवांस्ड AI के दौर में “रमहित यादव” का मतदाता सूची में हिंदी नाम “राम ने यादव को मारा” होना, न तो जातिगत मुद्दा है, न सामान्य गलती, और न ही ये सिर्फ़ टेक्निकल ग्लिच हो सकता है!
लिहाज़ा, सवाल ये होना चाहिए कि निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने ये सॉफ़्टवेयर:
-कितने पैसों में ख़रीदा,
-किससे ख़रीदा,
-स्पेसिफ़िकेशन क्या था, और
-क्या वही सॉफ़्टवेयर इस्तेमाल हुआ जिसकी क़ीमत दी गई थी?
लखनऊ अयोध्या से ज़्यादा दूर नहीं हैं, जब “भगवान राम के मंदिर” में चंदा चोरी हो सकती है, तो “चुनाव के मंदिर” में चोरी की संभावना से कैसे इंकार किया जा सकता है…
मोदी राज में अब वरिष्ठ अधिकारियों के प्रमोशन के अवसर भी लूटे जा रहे हैं, अभी तक और कौन कैसे लुटा:
उद्योगपति- इलेक्टोरल बांड के ज़रिए!
वोटर्स- SIR के ज़रिए!
छात्र- पेपर लीक के ज़रिए!
राम भक्त- चंदा चोरी के ज़रिए!
देश का संसाधन- अदानी के ज़रिए
सारी लूट सिर्फ़ इसलिए ताकि मोदी को जाना न पड़े…
प्रधानमंत्री जी, ये गिने-चुने अफसर रिटायरमेंट के बाद भी बार-बार सेवा-विस्तार पाकर देश के सबसे बड़े प्रशासनिक पदों पर काबिज हैं। इतने बड़े देश में सिर्फ चंद अफसरों को बार-बार सेवा-विस्तार देकर शीर्ष पदों पर बिठाए रखने की क्या मजबूरी है?
आपकी सरकार ने 31 जुलाई 2025 को लोकसभा में कहा था कि रिटायरमेंट के बाद सेवा-विस्तार केवल असाधारण परिस्थितियों में, जनहित में दिया जाता है। तो देश को बताइए- इन्हीं चुनिंदा अफसरों को बार-बार बनाए रखने की असाधारण मजबूरी क्या है? कौन-सा जनहित है, जिसे कोई दूसरा योग्य अधिकारी पूरा नहीं कर सकता?
जिन अफसरों के अवसर इन फैसलों से हमेशा के लिए ख़त्म हो रहे हैं, उन्होंने भी तीस-तीस साल जिलों में काम किया है, विभाग चलाए हैं, संकट संभाले हैं। कोई छह महीने बाद रिटायर होगा, कोई एक साल बाद। ऊपर बैठे अफसर को एक-दो साल और मिल गए, तो नीचे किसी योग्य अधिकारी का अवसर हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।
इससे भी बड़ा सवाल है- बार-बार सेवा-विस्तार की उम्मीद लगाए बैठा अफसर बिना किसी दबाव के देशहित में फैसले कैसे लेगा? जब अपने अगले सेवा-विस्तार की चिंता उसके फैसलों पर हावी होने लगे, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रशासन कैसे बचेगा? ऐसी निर्भरता पैदा करना ही स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रशासन के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है।
आपके चंद पसंदीदा अफसरों को बनाए रखने की कीमत दूसरे योग्य अधिकारी और देश की संस्थाएँ क्यों चुकाएँ?
प्रधानमंत्री जी, जवाब दीजिए!
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इलेक्टोरल बांड को असंवैधानिक घोषित किया!
क्या हुआ?
क्या जो हजारों करोड़ का चंदा बीजेपी ने इस बांड के ज़रिए लिया था, उसे वापस करना पड़ा? नहीं!
क्या इन पैसों से बीजेपी ने जो चुनाव जीता, उसे रद्द किया गया? नहीं!
तो अगर अब सुप्रीम कोर्ट SIR को असंवैधानिक घोषित करता भी है तो क्या होगा?
क्या सुप्रीम कोर्ट बिहार और बंगाल के चुनाव रद्द करेगा? शायद नहीं!
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के ट्रैक रिकॉर्ड को देखने हुए लगता है इस बार भी “डकैती” तो मानी जाएगी, पर उससे लूटी गई सम्पत्ति पर डकैतों का क़ब्ज़ा बरकरार रखा जाएगा!
क्या कहते हैं?
ये बड़ी दिलचस्प घटना है, लगभग हमारे हालात जैसी, बस क़िरदार थोड़ा अलग है…
बिहार की एक शेरनी को वन विभाग वालों नें बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व भेज दिया, यानि “पता” बदल गया!
एक दिन इस शेरनी का मूड किया और वो असम की तरफ़ चल पड़ी!
वन विभाग वालों नें सोचा थोड़ा घूम टहल कर वापस आ जाएगी, पर शेरनी नें लौटने का कोई इरादा नहीं दिखाया।
हुआ यूँ कि जब शेरनी का बिहार से बंगाल ट्रांसफर हुआ था तो इसनें फॉर्म 8 भरा, वोटर लिस्ट में अपना पता बदलवाने के लिए।
पर शेरनी अपने नए पते, यानि बंगाल में भी ज़्यादा दिन नहीं रही, वो बिना किसी को कुछ बताए चली गई असम!
इस बीच SIR शुरू हो गया!
और BLO पहुँचा शेरनी के बंगाल वाले पते पर। पड़ोसियों नें बताया कि वो तो कई दिनों से दिखाई नहीं दी।
लिहाज़ा, चुनाव आयोग नें इस शेरनी का नाम ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल से काट दिया, “शिफ़्टेड” केटेगरी में डालकर!
पर ये किसी को नहीं पता कि क्या शेरनी वाक़ई बंगाल से असम शिफ्ट हो गई है, या वो कुछ दिनों में घूम टहल कर वापस आ जाएगी!
फ़िलहाल बंगाल के वन अधिकारी उसे असम के गाँवों से ढूँडकर नींद की सुई लगाकर वापस लाने की योजना बना रहे हैं!
अब जब ये बंगाल वापस आएगी तो पाएगी कि इसका नाम वोटर लिस्ट से कट चुका है,
ऐसे में क्या इस शेरनी से फॉर्म 6 भरवाना सही होगा? क्योंकि ये फॉर्म तो पहली बार वोटर बनने के लिए भरा जाता है!
जबकि अपनी शेरनी का तो वोटर लिस्ट में नाम था, पहले बिहार, फिर बंगाल में!
तो ऐसे में क्या करना चाहिए? आख़िर इस शेरनी के लोकतांत्रिक अधिकार का सवाल है!
ख़ैर, फ़िलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। जज साहेब जो फ़ैसला करेंगे, हमारी शेरनी उसका पालन करेगी!
वैसे भी अभी बिहार, बंगाल और असम में चुनाव नहीं होने हैं, और एक जज साहेब नें बंगाल चुनाव से पहले कहा ही था कि इस बार नहीं तो अगली बार वोट डाल लेना!
तो शायद अगले चुनाव तक हमारी शेरनी का नाम वोटर लिस्ट में फिर से जुड़ जाए, बस इस बीच कोई बीजेपी वाला इसे बांग्लादेशी घुसपैठिया न घोषित कर दे!
तो देख रहे हैं, कितना मुश्किल हो गया है अब शेरों का अपनी मर्ज़ी से घूमना, घुसपैठिया कहलाने के रिस्क के साथ साथ वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने का भी खतरा बरक़रार है…
नोट: ये कहानी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है।
योगी आदित्यनाथ की चेतावनी, हिंसा के समर्थक या उसमे शामिल युवाओं को यूपी में सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी!
बिल्कुल सही बात है, हिंसा या हिंसक विचारधारा का हमारे समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए!
ख़ैर, अगर यही नीति 2017 में होती और मुख्यमंत्री पद पर भी लागू रहती, तो योगी जी का क्या होता?
योगी जी जब पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब उनके ख़िलाफ़ हिंसा से जुड़े चार आपराधिक मुक़दमे थे!
दंगा, आगजनी, भड़काऊ भाषण, धमकी, सरकारी आदेश की अवहेलना, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसी “हिंसक” धाराओं में मुक़दमे दर्ज थे, योगी जी के ख़िलाफ़!
लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद ये सारे मुक़दमे या तो सरकार नें वापस ले लिए या कोर्ट ने बंद कर दिए!
आज योगी जी बिल्कुल पाक साफ़ हैं, दामन पर कोई दाग नहीं है!
लिहाज़ा, अब योगी जी कह रहे हैं कि जिस रास्ते पर कभी वो ख़ुद चले थे, उस पगडंडी पर भी आज के युवा न चलें!
योगी जी आज के यूपी के युवाओं का “रोल मॉडल” नहीं बनना चाहते, ग़ज़ब “त्याग की भावना” है इनमे!
इसलिए योगी जी बिलकुल “मिर्जापुर वाले मुन्ना भैया” की स्टाईल में युवाओं को नसीहत दे रहे हैं कि, “पढ़ाई लिखाई करो, आईये वाइये बनों, कहाँ राजनीति की चक्कर में पड़ रहे हो”!
ख़ैर, हक़ीक़त ये है कि योगी जी हिंसा का नाम लेकर बड़ी चालाकी से युवाओं को सामाजिक बदलाव की माँग करने वाले किसी भी आंदोलन में शामिल होने के ख़िलाफ़ चेतावनी दे रहे हैं!
वो जानते हैं, कि चूँकि युवाओं पर उनकी नसीहत का कोई असर नहीं पड़ेगा, इसलिए उनकी ये चेतावनी युवाओं को नहीं बल्कि उनके माता पिता को है।
आज के युवाओं के 40 से 60 साल की उम्र के माँ बाप की ज़िम्मेदारी होगी कि वो अपना डर अपने नौजवान बच्चों पर ट्रांसफर करें और वोट योगी जी को!
साथ ही माँ बाप अपने बच्चों को इमोशनली ब्लैकमेल करें कि, बेटा कुछ भी ऐसा वैसा मत करना नहीं तो कोर्ट कचहरी का चक्कर पड़ जाएगा,
और जो तुम्हारे “सुनहरे भविष्य” के लिए योगी जी नें लाखों नौकरियाँ थाल पर सजा कर रखी है, वो तुम्हें नहीं मिलेगी!
और इस तरह योगी जी का शासन सुरक्षित रहे, युवाओं की अपेक्षाओं से उपजी सामाजिक बदलाव की आँधी उसे छू भी न सके,
और प्रदेश का युवा नौकरी का फॉर्म भरकर, पेपर लीक न होने की प्रार्थना करते हुए, बेरोज़गारों की लंबी क़तार में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करे,
और तब तक योगी जी अपनी ख़ुद की नौकरी का एक और कार्यकाल बुलडोज़र पर बैठकर पूरा करें…
दिल्ली में सरकार किसकी है? बीजेपी की!
दिल्ली का स्वास्थ्य मंत्री कौन है? डॉ. पंकज कुमार सिंह!
दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में कितना बड़ा घोटाला हुआ? ₹842 करोड़ का!
कौन कह रहा है कि घोटाला हुआ? ख़ुद दिल्ली सरकार की एंटी करप्शन ब्रांच!
₹14.9 लाख की X-Ray मशीन कितने में ख़रीदी गई? ₹37.8 लाख में!
₹25 करोड़ की बेडशीट, कवर और चादर कितने में ख़रीदे गए? ₹75 करोड़ में!
₹1.25 करोड़ के ORS पैकेट कितने में ख़रीदे गए? ₹7.5 करोड़ में!
₹20-25 करोड़ के ऑपरेशन के समान कितने में ख़रीदे गए? ₹100 करोड़ में!
क्या एंटी करप्शन ब्रांच की FIR या चार्जशीट में दिल्ली की अवैध बीजेपी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री का नाम है? नहीं
आख़िर इतने बड़े स्वास्थ्य घोटाले में स्वास्थ्य मंत्री जाँच के घेरे में क्यों नहीं हैं, उनके घर-दफ़्तर पर क्यों छापे नहीं पड़े, क्यों गिरफ़्तार नहीं हुए?
-क्योंकि वो बीजेपी के मंत्री हैं, क़ानून से ऊपर हैं!
-चंदा चोरों की पार्टी से और क्या उम्मीद की जा सकती है!
RSS वाकई देश के लिए बहुत घातक है, ख़तरनाक है!
अच्छे ख़ासे इंसान को सांप्रदायिक बनाने की क़ाबिलियत रखती है RSS!
इसका ताज़ा तरीन उदाहरण हैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर योगेश सिंह!
योगेश सिंह एक बेहतरीन शिक्षाविद हैं। मैं इन्हें 2016 से जानता हूँ जब ये DTU के वाईस चांसलर बने थे!
एक निहायत ही सुलझे हुए व्यक्ति, अपने विषय में महारत, उत्कृष्ट प्रशासनिक क्षमता, ये इनकी ख़ूबी थी!
पिछले दस सालों में मैं जितने वाईस चांसलर्स के संपर्क में आया उनमें से ज़्यादातर या तो अकेडमिक महत्ता रखते हैं, और या प्रशासनिक।
इन फ़ैक्ट, कई तो किसी भी लायक़ नहीं होते, वो सिर्फ़ सत्ता के “आशीर्वाद” की वजह से ही वाईस चांसलर का पद सुशोभित करते हैं!
पर योगेश सिंह उन चुनिंदा वाईस चांसलर्स में से हैं जो कि विद्वान होने के साथ साथ कुशल प्रशासक भी हैं।
यही नहीं, योगेश सिंह एक अच्छे इंसान भी हुआ करते थे।
मुझे लगता था, और शायद है भी कि योगेश सिंह दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर अपनी योग्यता से बने थे।
पर शायद RSS ने इन्हें इस बात का एहसास दिलाया है कि इनकी क़ाबिलियत कोई मायने नहीं रखती, ये भी “आशीर्वाद” वाली कैटेगरी से हैं।
लिहाज़ा, दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर के पद पर बने रहने, या और आगे बढ़ने के लिए, वो शायद अब किसी भी हद तक जा सकते हैं।
जब GenZ देश के शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग को लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे, तब योगेश सिंह ने यूनिवर्सिटी के छात्रों को इसमें शामिल न होने की चेतावनी जारी की थी।
और अब तो ये देश की सेना को ही कह रहे हैं कि “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा” की धुन न बजायें!
क्यों? क्योंकि इस काव्य के रचयिता ने आगे चलकर पाकिस्तान की “हिमायत” की थी!
जब एक मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति ऐसी तर्कहीन बात करता है तो देश की चिंता होती है!
ख़ैर, उम्मीद है कभी तो योगेश सिंह और इन जैसे तमाम क़ाबिल शिक्षाविद RSS की काली छाया से बाहर निकलेंगे!
और तब का भारत “शैक्षिक क्षेत्र” में इनके योगदान को उचित सम्मान देता रहेगा,
बिना इस बात पर जजमेंटल हुए कि एक दौर में अपनी महत्वाकांक्षा के चलते ये RSS की गोद में बैठ गए थे, उसके सांप्रदायिक एजेंडे की “हिमायत” कर रहे थे…
“आपको झुकने के लिए कहा गया, पर आप तो रेंगने लगे”
इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी की “वंदना” करने वाली मीडिया पर लालकृष्ण आडवाणी का कटाक्ष था ये!
आज ये दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर योगेश सिंह पर भी बख़ूबी उतरता है!
दरअसल, मोदी सरकार को वाईस चांसलर योगेश सिंह से केवल दो मुद्दों पर “झुकने” की अपेक्षा थी।
पहली, मोदी जी की BA की डिग्री से संबंधित सूचनाओं को “राष्ट्रहित” में “अति गोपनीय” रखें!
और दूसरी, यूनिवर्सिटी और डीयू कॉलेज में कोई भी नियुक्ति सिर्फ़ RSS के “मार्गदर्शन” में हो!
योगेश सिंह इन दोनों मुद्दों पर अच्छी तरह झुके, पर अब वो रेंगना भी चाहते हैं!
लिहाजा, RSS के एक इवेंट में इन्होंने कहा की देश की सेना को “सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तान हमारा” की धुन नहीं बजानी चाहिए!
क्यों? क्योंकि इस गीत के लेखक इक़बाल आगे चलकर पाकिस्तान बनाने के पक्षधर हो गए थे!
यानि अगर योगेश सिंह की मानें तो “हिंदुस्तान सारे जहाँ से अच्छा नहीं रहा” क्योंकि इक़बाल हिंदुस्तान के नहीं रहे!
वैसे तब के इक़बाल और अब के योगेश सिंह में कोई ख़ास अंतर नहीं है, दोनों को “मौकापरस्त” कहा जा सकता है!
इक़बाल एक बेहतरीन कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे। कैंब्रिज से BA और जर्मनी से Phd किया था। लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते भी थे।
योगेश सिंह भी बेहतरीन शिक्षाविद हैं। सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर इंजीनियरिंग में Phd किया है। पिछले 15 सालों से किसी न किसी यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर रहे हैं!
इक़बाल ने उर्दू और फ़ारसी में कई किताबें लिखी हैं। इन्होंने 1904 में “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा” लिखा जिसे “तराना-ए-हिंदी” का नाम से जाना जाता है!
योगेश सिंह ने भी 250 से ज़्यादा रिसर्च पेपर्स लिखे हैं। इनकी किताब “सॉफ्टवेर टेस्टिंग” विश्वविख्यात है। 1999 से 2008 के दौरान सॉफ्टवेर में ये भारत के तीसरे सबसे विख्यात रिसर्चर माने जाते थे!
इक़बाल को 1923 में ब्रिटिश हुकूमत ने नाईट की उपाधि से नवाज़ा। 1926 से 1929 तक वो पंजाब विधान परिषद के सदस्य रहे।
योगेश सिंह को 2016 में केजरीवाल सरकार ने दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी का वाईस चांसलर बनाया। फ़िर 2021 में मोदी सरकार ने इन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी का वाईस चांसलर नियुक्त किया।
2026 में मोदी सरकार ने योगेश सिंह को दोबारा दिल्ली यूनिवर्सिटी का वाईस चांसलर बनाया, जो कि इस यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहली बार हुआ है।
इक़बाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में अलग मुस्लिम मेजोरिटी देश पाकिस्तान का ज़िक्र किया!
शायद तब इक़बाल को लगा होगा कि “हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा” का समय पूरा हुआ, अब अपनी महत्वाकांक्षा के लिए नया वतन बना लेना चाहिए, लिहाज़ा उनकी राजनैतिक विचारधारा बदल गई, वो मुस्लिम लीग की गोद में बैठ गए!
इसी तरह 2011 में बड़ौदा यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर के रूप में जो करियर योगेश सिंह का शुरू हुआ, वो अब दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर के दूसरे टर्म पर पहुँच चुका है!
अब इक़बाल की तरह ही योगेश सिंह को भी अपनी महत्वाकांक्षा की अगली उड़ान के लिए ठोस “लाँचपैड” की ज़रूरत महसूस हो रही होगी।
तो जो ख़ूबी इक़बाल को 86 साल पहले मुस्लिम लीग में दिखी थी, वही अब योगेश सिंह को RSS में दिख रही है।
ख़ैर, चूँकि योगेश सिंह एक निहायत ही मौकापरस्त इंसान हैं इसलिए वो सच्चे देशभक्त की भावना समझ ही नहीं सकते!
“सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तान हमारा” की एक एक लाइन आज भी सच्चे देशभक्त के रौंगटे उसी तरह से खड़े करती है जैसे “जन गण मन” या “वंदे मातरम्” के उद्घोष से होता है!
ये रचनाएँ हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं, इसे लिखने वाले की व्यक्तिगत संपत्ति समझना इसका अपमान है!
पर ये भाव योगेश सिंह नहीं समझ सकते क्योंकि उन्हें तो अपने अगले ओहदे की तलाश है..
“अगर अपनी माँ का दूध पीया है तो बिना ज्ञानू और चुनाव आयोग की बैसाखी के चुनाव लड़ के दिखा”
खरगे जी, अगली बार जोश में ये मत बोल दीजिएगा, और बोलिएगा भी तो महामानव का नाम मत लीजिएगा!
वर्ना भक्तगण फ़िर उत्तेजित हो जायेंगे, कहेंगे आपने:
-“माँ के दूध का अपमान किया”
-“माँ के दूध की न्यूट्रिशनल वैल्यू पर सवाल उठाया”
खरगे जी, आप “माँ द्रोही” कहलाए जायेंगे, टीवी पर बहस होगी कि कांग्रेस “माँ के दूध विरोधी” है!
इसलिए “राष्ट्रहित” में आप “नॉन बायोलॉजिकल” महापुरुष के “बायोलॉजिकल” रिश्तों का कोई ज़िक्र न करें…
हुज़ूर, हाँथी लेटा हुआ है, हिल डुल नहीं रहा, कुछ खा-पी नहीं रहा, और साँस भी नहीं ले रहा!
तो सीधे कहो न कि हाँथी मर गया है!
हुज़ूर, ये हम नहीं कह सकते!
इस कहानी का फॉर्म 6 में बदलाव, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग से कुछ लेना देना नहीं है, कोई भी समानता महज़ संयोग है…
सुप्रीम कोई में दायर हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा है कि - फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं हुआ है!
#SIR #SupremeCourt
मेरी “माँ को गाली” दी के बाद, अब मेरे “बाप को बेइज़्ज़त” किया पर “राष्ट्रीय आंदोलन” होगा…
दरअसल, कोई भी भारतीय किसी की “माँ को गाली” नहीं देता, बल्कि हर गाली देने वाला “माँ की गाली” देता है!
इसी तरह कोई किसी के “बाप को बेइज़्ज़त” नहीं करता, बल्कि बाप के माध्यम से औलाद के पौरुष को ललकारता है!
यहाँ तक कि अक्सर माएँ भी ग़ुस्से में अपनी औलाद से कहती हैं, “तुम्हारा बाप भी मुझसे फ़लाँ काम नहीं करवा सकता”!
लिहाज़ा “भारतीय ज्ञान परंपरा” का डंका पीटने वालों को ये पता होना चाहिए कि “माँ की गाली” और “बाप के नाम की ललकार” उसी परंपरा का अपभ्रंश है!
इसलिए भाड़े की भीड़ जुटाकर उत्तेजित होने का नाटक मत करिए!
अगर वाकई इन तथाकथित “उत्तेजित” लोगों में से किसी को भी इस “फ़िगर ऑफ़ स्पीच” से फ़र्क़ पड़ता तो हमारा देश, ख़ासकर उत्तर भारत, भाषाई अभिव्यक्ति के मामले में कहीं ज़्यादा सभ्य होता…
कहानी दो “कुमारों” की, मोदी जी के दो “प्रयोगों” की-नरेश कुमार और ज्ञानेश कुमार!
अरविंद केजरीवाल और ममता बैनर्जी आँख की किरकिरी बन गए थे, मोदी जी के लिए!
वो समझ चुके थे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के ज़रिए इन्हें नहीं हराया जा सकता!
क्योंकि मोदी जी की “पीक पॉपुलैरिटी” के दौर में भी ये दिल्ली और बंगाल में बीजेपी को ऐसे हराते थे, जैसे भारतीय क्रिकेट टीम हॉलैंड को हराती है!
तो प्रयोग के रूप में मोदी जी नें 2022 में पहले “कुमार”, यानि नरेश कुमार को दिल्ली का मुख्य सचिव बनाया।
अपने कार्यकाल के पहले ढाई महीने में ही “कुमार साहेब” नें दिल्ली की नई शराब “नीति” को “घोटाला” बना दिया!
और यहीं से शुरू हुआ अरविंद केजरीवाल को बदनाम करने और सरकार को पंगु बनाने का खेल!
ख़ुद नरेश कुमार नें कोर्ट को दिए हलफ़नामे में बतौर मुख्य सचिव, अपनी जिन नौ उपलब्धियों को चिन्हित किया है, उनमे से सात ये हैं:
पहली, शराब घोटाले को बेनक़ाब करना!
दूसरी, शीशमहल” की जाँच!
तीसरी, बिजली कंपनियों की सब्सिडी में घोटाला बेनक़ाब!
चौथी, बिजली कंपनियों के रिकॉर्ड में घोटाले का पर्दाफास!
पाँचवी, आप विधायक अमानतुल्ला ख़ान के ख़िलाफ़ CBI को मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी!
छठी, दिल्ली जल बोर्ड के सीईओ उदित प्रकाश के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्यवाही!
सातवीं, सरकारी विज्ञापनों के मामले में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग पर कार्यवाही!
यही नहीं, कुमार साहेब की आठवीं उपलब्धि ये थी कि अधिकारियों के ख़िलाफ़ जनता सीधे शिकायत न कर सके, उस पर इनकी पहरेदारी रहे, ऐसे ऑनलाइन सिस्टम का निर्माण!
इनकी एक मात्र “पॉजिटिव” उपलब्धि थी मोदी सरकार द्वारा आयोजित G20 समिट के लिए दिल्ली को लीपपोत कर तैयार करना!
यानि इन्होंने अपनी भूमिका मुख्य सचिव के रूप में नहीं बल्कि एक थानेदार की तरह निभाई!
राज्य के विकास से संबंधित मुद्दे जैसे शिक्षा, स्वास्थ, यातायात, रोज़गार, प्रदूषण, यमुना की सफ़ाई, महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध रोकने में नरेश कुमार नें कोई रुचि नहीं ली!
तो जहाँ केजरीवाल सरकार दिल्ली वालों के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े मसलों पर काम कर रही थी, वहीं उसी सरकार के मुख्य सचिव नरेश कुमार रोज़ नई तरकीब निकाल रहे थे उन कामों में बाधा डालने की!
इनकी रणनीति ये थी कि “दिल्ली को ठप्प और अरविंद केजरीवाल को भ्रष्ट” घोषित किया जाए,
ताकि कुछ लोग प्रशासनिक दिक़्क़तों की वजह से और कुछ केजरीवाल को भ्रष्ट मानकर आप को अगले चुनाव में वोट न दें!
और काफ़ी हद तक ऐसा ही हुआ, जो कुछ उन्नीस बीस रह गया उसे कुछ चुनिंदा इलाक़ों में वोट काटकर और फ़र्ज़ी वोट जोड़कर पूरा कर लिया!
नतीज़ा, 2025 के दिल्ली चुनाव में 46% वोटों के साथ बीजेपी को 48 सीटें मिली और आप को 44% वोटों के साथ 22 सीटें!
यानि सारा ज़ोर लगाने के बाद भी बीजेपी को आप से मात्र 2% ज़्यादा वोट मिले, सोचिए अगर नरेश कुमार बैटिंग न कर रहे होते, तो बीजेपी का क्या हाल होता?
तो बीजेपी की तरफ़ से दिल्ली के मैन ऑफ़ द मैच रहे नरेश कुमार!
अब दिल्ली में सफल प्रयोग के बाद बंगाल में “दूसरे कुमार” नें गुल खिलाया!
चूँकि बंगाल पूर्ण राज्य है, वहाँ बिना मुख्यमंत्री की मंज़ूरी के मोदी जी किसी भी अधिकारी को नियुक्त नहीं कर सकते थे।
इसलिए दिल्ली में बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त को कमान सौंपी गई!
बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार नें बंगाल में ठीक चुनाव से पहले 91 लाख लोगों का नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया, जो की कुल वोटर्स का 12% है!
नतीज़ा, 2026 के बंगाल चुनाव में 46% वोटों के साथ बीजेपी को 207 सीटें मिली और ममता बैनर्जी की पार्टी को 41% वोटों के साथ 80 सीटें!
यानि यहाँ भी बीजेपी के सारे जोर के बाद भी वोटों का अंतर सिर्फ़ 5% है!
यानि दिल्ली की तरह अगर बंगाल में भी मोदी जी की तरफ़ से एक और कुमार न खेल रहे होते तो बीजेपी मैदान में कहीं भी न टिकती!
तो इस तरह इन “दो कुमारों” द्वारा संविधान के प्रति ली गई अपनी शपथ के साथ गद्दारी करने और “मोदी साम्राज्य” के अनैतिक विस्तार का माध्यम बनने के लिए देश इन्हें हमेशा “याद” रखेगा!
इसलिए ये और भी ज़रूरी है कि इस “दूसरे कुमार” का खेल यहीं रोक दिया जाए नहीं तो अब मोदी जी अपना साम्राज्य जनता के वोट से नहीं, “कुमारों” की ग़द्दारी के ज़रिए क़ायम भी रखना चाहेंगे…
अगर पंजाब में बीजेपी की सरकार बनी तो अमित शाह जी दो साल के अंदर उसे “नशा मुक्त” बना देंगे!
कैसे? इसका ज़वाब बिहार पुलिस की स्पेशल ब्राँच और ऑपरेशंस प्रमुख कुंदन कृष्णन देते हैं!
ये मानते हैं कि पंजाब की भगवंत मान सरकार का नशे के विरुद्ध सामाजिक चेतना और कम्युनिटी को साथ लेकर चलने की रणनीति ही कारगर कदम है!
कुंदन जी का मानना है कि सिर्फ़ पुलिस एक्शन से नशे पर लगाम नहीं लगाई जा सकती, पंजाब की तरह सरकार और समुदाय को मिलकर नशे के विरुद्ध काम करना होगा!
बिहार में बीजेपी की सरकार है, और वहाँ के पुलिस प्रमुख नशे के विरुद्ध कारगर रणनीति के लिए पंजाब की तरफ़ देख रहे हैं!
और अगर अमित शाह जी वाक़ई देश को नशा मुक्त बनाना चाहते तो वो भी पंजाब की तरफ़ ही देखते!
वो पंजाब के मॉडल को बिहार और अन्य नशा प्रभावित राज्यों में लागू करने की रणनीत बनाते!
पर अफ़सोस कि अमित शाह जी नशे को सिर्फ़ पंजाब की सत्ता पाने की रणनीति के तहत देख रहे हैं!
सोचिए, क्या गृह मंत्री का काम सिर्फ़ बीजेपी को चुनाव जिताना है या देश को समस्याओं से निज़ात भी दिलाना?
इनके हावभाव देख कर आपको क्या लगता है?
Shailendra Sharma retweeted
इस बच्ची की मौत की खबर पढ़कर मन बहुत दुखी है। एक बच्ची का इस तरह टूट जाना हम सबके लिए गंभीर सवाल है।
दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हमने ‘हैप्पीनेस क्लास’ इसलिए शुरू की थी कि बच्चे मानसिक और भावनात्मक रूप से मज़बूत बनें। इस क्लास में हर बच्चा रोज़ाना Meditation करता था, अपने मन और विचारों का अध्ययन करता था। कृतज्ञता का अभ्यास करता था और मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना सीखता था।
इसका असर उनके stress सँभालने की क्षमता और स्कूल से घर तक उनके रिश्तों में दिखने लगा था। इसके नतीजे देखकर इसे देश ही नहीं, पूरी दुनिया में सराहा गया। कई international scholar इस पर research कर रहे थे।
लेकिन BJP सरकार ने अपनी छोटी राजनीतिक सोच के कारण हैप्पीनेस क्लास बंद कर दी। अफ़सरों, प्रिंसिपलों और शिक्षकों को धमकाया गया कि हैप्पीनेस क्लास की बात भी की तो AAP समर्थक मान लिए जाओगे।
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए शुरू किए गए पाठ्यक्रम को राजनीतिक संकीर्णता के कारण बंद कर दिया गया।
भाजपा की मुझसे और आम आदमी पार्टी से दुश्मनी हो सकती है, लेकिन उसका बदला दिल्ली के बच्चों से क्यों? याद रखिए - बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य हमारी राजनीतिक लड़ाइयों से कहीं बड़ा है।
डायन भी सात घर छोड़ देती है पर दिल्ली की अवैध बीजेपी सरकार तो उससे भी बदत्तर है…
सरकारी स्कूल के बच्चों की किताबों में भी कमीशनखोरी!
इनके “काले कारनामों” से शिक्षा विभाग के वो अधिकारी और कर्मचारी डरने लगे हैं, जिन्होंने इन फाइलों पर दस्तख़त किए हैं!
इनमे से कुछ अब ख़ुद इनके “तौर तरीकों” की ख़बर दे रहे हैं!
वो समझने लगे हैं कि वोट चोरी के दम पर बनी सरकार जिस दिन गिरेगी, सारी चोरी का हिसाब होगा!
और बच्चों के भविष्य के साथ खेलने वालों को मुँह छुपाने की भी जगह नहीं मिलेगी…
मंत्री आशीष सूद ने एक बात तो मान ली की दिल्ली सरकार द्वार सरकारी स्कूलों में बाँटी जाने वाली पुस्तक मल्हार का साइज NCERT की पुस्तकों से छोटा है । इससे ज़ाहिर तौर पर बच्चों को परेशानी होगी ।
मगर आशीष सूद एक बहुत खास बात को दबा गए - वो है टेंडर में दी गई किताबों की प्रिंटिंग क्वालिटी और कगाज की क्वालिटी । टेंडर में यह साफ़ है की किताबों में इस्तेमाल होने वाला कागज़ 80 GSM को होना चाहिए मगर जो किताब सरकार द्वार बाटी गई है उनका काग़ज़ करीब 60 GSM का है। और प्रिंटिंग क्वालिटी भी बेहद घटिया है ।
दिल्ली सरकार के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए पाठ्यपुस्तकों और स्टेशनरी की आपूर्ति में 2026–27 के शैक्षणिक सत्र (जो 1 अप्रैल, 2026 से शुरू हुआ था) की शुरुआत में भारी देरी देखी गई। इसके कारण लाखों बच्चों को अनिवार्य अध्ययन सामग्री के बिना ही कक्षाओं में शामिल होने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इसके आलवा टेंडर में साफ़ लिखा था की यदि वर्क ऑर्डर के 45 दिनों के अंदर, किताबों की डिलीवरी नहीं हुई तो प्रति हफ़्ते 5% की पेनल्टी लगाई जाएगी । और यदि देरी पंद्रह दिन से ज़्यादा बढ़ जाती है तो कांट्रेक्टर को ब्लैकलिस्ट तक किया जा सकता है ।
हमरा आशीष सूद जी से सवाल है की क्या आपके विभाग में कुछ अधिकारी इन ठेकेदार को पूरी पेमेंट देने की फाइल चला रहे थे ?
हम आपको चुनौती देते हैं की आप अपनी विभाग की फाइल को पब्लिक करें । क्या आपके विभाग द्वार इस ठेकेदार को पूरी पेमेंट देने की फाइल चलाई जा रही थी जिस पर विभाग के सेक्रेटरी ने मना कर दिया था ? यदि आपके विभाग में इस ठेकेदार को दिए जाने वाले भुगतान पर पेनल्टी लगाएं जाने वाली फाइल चल रही थी तो उसको आप पब्लिक कर दे ।
गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'सोशल ज्यूरिस्ट' ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक अवमानना याचिका दायर की, जिसमें शैक्षणिक सामग्री का समय पर वितरण सुनिश्चित करने संबंधी अदालत के पिछले आदेशों का पालन न करने का आरोप लगाया गया। न्याय मूर्ति सचिन दत्ता ने इस लापरवाही पर दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई। इसके जवाब में, स्थायी वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि शेष सभी पुस्तकों की आपूर्ति गर्मियों की छुट्टियों से पहले कर दी जाएगी।
साथ ही मैं आपको चुनौती देता हूँ कि आप इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा करने के लिए स्थान और समय बतायें, मैं आपसे चर्चा करके जनता के सामने दूध को दूध पानी की पानी करना चाहता हूँ । आशा है आप इसका जवाब देंगे ।
बीजेपी की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी लेखी का देश के युवाओं को “पंचामृत” रूपी पाँच ज्ञान:
1. ख़ुद को “अमृत पीढ़ी” कहिए, GenZ नहीं!
2. सवाल पूछना बंद करिए!
3. सोशल मीडिया नया “अफ़ीम” है!
4. सड़क पर प्रदर्शन करना, धरना देना, राष्ट्रपति भवन और सुप्रीम कोर्ट जाना सही तरीका नहीं है!
5. 500 लोग देश को नहीं बदल सकते!
मीनाक्षी लेखी जी दिल्ली से लोकसभा सांसद थीं, और मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री हुआ करती थीं।
आजकल मोदी जी के “विचार” जनमानस, ख़ासकर युवाओं तक पहुँचाने का काम कर रही हैं…
अमित शाह जी नें विजयदशमी के दिन पंजाब की जनता से एक संकल्प किया है!
इनका संकल्प है कि ये 31 दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशा मुक्त कर देंगे!
अमित शाह जी, लगे हाँथ बिहार को भी नशा मुक्त करने का संकल्प ले लेते, कोई तारीख़ दे देते!
गाँजा, चरस, हेरोइन, कोकीन, मॉर्फिन, डोडा, ओपियम, केमिकल ड्रग, ये सब बिहार में बड़ी मात्रा में मिल रहे हैं और इस्तेमाल हो रहे हैं!
इंडियन एक्सप्रेस की आजकी ये रिपोर्ट देख लीजिए!
पंजाब में बीजेपी की सरकार नहीं है, यहाँ चुनाव होने जा रहे हैं और बीजेपी अपनी सरकार बनाना चाहती है इसलिए यहाँ का नशा अमित शाह जी को दिख रहा है!
वहीं, बिहार में बीजेपी की सरकार है, यहाँ हाल में ही चुनाव हुए थे, अगले पाँच साल के लिए वोट लिए जा चुके हैं, इसलिए अमित शाह जी को यहाँ का नशा नहीं दिख रहा है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार, लाओस, और थाईलैंड से ड्रग्स भारत के नार्थ ईस्ट राज्यों में पहुँचते हैं।
फ़िर मणिपुर, मिज़ोरम, असम और अरुणाचल प्रदेश के रास्ते ये बिहार पहुँचते हैं।
देश की सीमाओं की सुरक्षा अमित शाह जी के मंत्रालय का काम है, और जिन राज्यों से ड्रग्स आगे जाता है वहाँ बीजेपी की सरकार है!
पर अमित शाह जी बिहार या इन नार्थ ईस्ट राज्यों को नशा मुक्त करने का संकल्प यहाँ की जनता के बीच जाकर नहीं लेते हैं, लेकिन पंजाब के लिए आज से ही “संकल्पित” हो गए हैं!
है न कमाल?
वैसे ये वही अमित शाह हैं जो कई साल पहले, इसी तरह चुनाव की पूर्व संध्या पर असम और बिहार को बाढ़ मुक़्त करने का संकल्प ले चुके हैं!
और ये दोनों राज्य हर साल की तरह इस साल भी बाढ़ में ख़ूब डूबे!
पर फ़िर भी अमित शाह जी संकल्प लेने के अपने संकल्प पर पूरी तरह क़ायम हैं, वो भी इस क़दर की अब इनके झूठ को भी शर्म आने लगी है…
“12 साल सत्ता में रहनें के बाद भी बीजेपी को नए दुश्मन ईजाद करने पड़ रहे हैं, ख़ुद को प्रासंगिक रखने के लिए”
ये कहना है बीजेपी के पूर्व तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलाई का!
अन्नामलाई नें IPS की नौकरी छोड़कर बीजेपी जॉइन की थी, मोदी जी से ख़ासा प्रभावित थे!
अन्नामलाई नें 2011 के एक भाषण का ज़िक्र किया जिसमें बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी जी कह रहे हैं, कि अगर उनके हाँथ न बंधे होते तो वो ख़ुद दिल्ली जाकर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ देते!
वो तब की केंद्र सरकार द्वारा एंटी करप्शन मूवमेंट पर पुलिस की कार्यवाही का विरोध कर रहे थे!
और आज वही मोदी जी कॉकरोच जनता पार्टी के लीडर्स को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर भी जेल में डाल रहे हैं, प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन चलवा रहे हैं, जंतर मंतर पर धरना बैन कर रहे हैं!
जो ख़ुद मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर होते हुए केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की बात करते थे वो आज बतौर प्रधानमंत्री देश को “रेजीम चेंज” के “ख़तरे” से आगाह कर रहे हैं!
दरअसल, मोदी जी ख़ुद डरे हुए हैं।
इनका हर झूठ जनता के सामने आ रहा है, वोट चोरी इनकी “रेजीम की वैधता” पर सवाल उठाती है!
इसलिए मोदी जी अपने “राजनैतिक विरोधियों” को “देश के दुश्मन” के रूप में पेश करने की आख़िरी कोशिश कर रहे हैं!
पर अब मोदी जी की असलियत उनके पुराने सहयोगी भी समझ रहे हैं इसलिए उन्हें ख़ुद “रेजीम चेंज” की आहट सुनाई दे रही है…
ओह नो…
मोदी जी का एक और नगीना चुल्लू भर पानी में डूबते हुए रंगे हाँथों पकड़ा गया!
और एक बार फ़िर मोदी जी अपने “रेजीम” की पूरी ताक़त झोंक देंगे इसे भी बचाने के लिए..















