
Associate Editor @aajtakradio, Podcast: Padhaku Nitin & Sandarbh, Ex @CNBC_awaaz, @TV9Bharatvarsh, @News24tvchannel •Lawyer • Writer of #इतिइतिहास, #नफरतीचिंटू
Noida, India
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जंतर मंतर सिर्फ एक प्रोटेस्ट साइट नहीं है।
जब अंग्रेज़ों के प्रभुत्व तले दुनिया अपनी घड़ी उनके मुताबिक सेट नहीं कर रही थी, रोमन कैलेंडर हमारी चर्या तय नहीं करते थे, पंचांगों का बहुत महत्व था और हिंदू मुसलमान मिल जुलकर इस देश की गति तय कर रहे थे उस वक्त जंतर मंतर का अपना महत्व था। जंतर मंतर भी अलग अलग पांच थे, दिल्ली, जयपुर, वाराणसी, उज्जैन, मथुरा में।
दिल्ली में जिन पांच छह इमारतों को मिलाकर हम जंतर मंतर मानते हैं वो दरअसल इमारत नहीं “यंत्र” हैं। ऐसे यंत्र जो आकाश में विचरते ग्रह नक्षत्रों के मुताबिक समय बताते थे। जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं सदी की शुरुआत यानि 1724 से 1735 के बीच में ये सारे जंतर मंतर बनवाए। उन्हें गणित और खगोल में बड़ी दिलचस्पी थी। इसी के चलते उन्होंने ध्यान दिया कि उनके दौर में इस्तेमाल हो रही सारणियों और ब्रास/तांबे के छोटे यंत्रों से हो रही गणना गड़बड़ा रही हैं। ये यंत्र छोटे तो थे ही, मौसम बदलने पर फैलते- सिकुड़ते भी थे। नतीजतन गणनाओं में चूक हो रही थी। तब उन्होंने फैसला लिया कि चूने और लाल बलुआ पत्थर के विशाल, स्थायी यंत्र बनवाए जाएंगे ताकि सेकेंड के सूक्ष्म हिस्से तक सटीक समय और ग्रहों की सही स्थिति मापी जा सके।
सबसे पहले उन्होंने इस क्रम में दिल्ली वाला जंतर मंतर बनवाया जो उस वक्त के शहर से बाहर था। ये जगह जयसिंहपुरा कहलाती थी। महाराजा के अधीन थी। आसमान साफ तौर पर देखा जा सके इसलिए इस जगह को चुना गया। यहां जो इमारतें यानि यंत्र आप अगली छुट्टी में दोस्तों या परिवार के साथ देखने जा सकते हैं उनके नाम सम्राट यंत्र, मिश्र यंत्र, राम यंत्र, जयप्रकाश यंत्र हैं। सबसे मशहूर मिश्र यंत्र है जिसे आप देखकर बता देते हैं कि ये तो जंतर मंतर है।
लिखते लिखते बता दूं कि जैसे आज दुनिया के लिए ग्रीनविच (0°) प्राइम मेरिडियन है, वैसे ही प्राचीन भारत में उज्जैन को दुनिया की मुख्य मध्याह्न रेखा माना जाता था। वराहमिहिर और आर्यभट्ट के समय से ही उज्जैन को हिंदू खगोलशास्त्र का केंद्र माना गया क्योंकि ये कर्क रेखा पर स्थित था। इसके चलते सवाई जय सिंह ने उज्जैन में भी जंतर मंतर बनवाया ताकि उज्जैन के स्थानीय समय के आधार पर भारत के पंचांग और समय की सटीक गणना जारी रह सके।
जय सिंह इस ज्ञान को लेकर इतने उत्सुक और उत्साही थे कि जंतर मंतर की रीडिंग्स लेकर ऑब्ज़र्व करते थे। उन्होंने पश्चिम के खगोलविदों से ये आंकड़े शेयर किए। 1727 में एक टीम इस सिलसिले में पुर्तगाल के लिस्बन भेजी गई। इसमें जेसुइट पादरी फादर मैनुअल डी फिग्युरेइदो और जय सिंह के प्रतिनिधि पेड्रो डि सिल्वा थे। ये दल वापसी में उनके लिए यूरोप के सबसे शानदार खगोलीय उपकरण, किताबें और डेटा लेकर आया। राजा जय सिंह ने यूरोप की टेबल्स पढ़ीं और उसकी तुलना अपने जंतर मंतर वाली रीडिंग्स से की।
उन्होंने पाया कि यूरोपीय सारणियों में दिए गए चंद्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण और चंद्रमा की गति से जुड़े कुछ पूर्वानुमानों में कई मिनट की चूक थी। उन्होंने फ्रांस, पुर्तगाल और जर्मनी से खगोलविदों को जयपुर आमंत्रित किया और उन्होंने जयपुर के जंतर मंतर पर बैठकर रीडिंग्स लीं। ये आंकड़े यूरोप की अकादमियों जैसे पेरिस की रॉयल एकेडमी ऑफ साइंसेज को भिजवाए गए।
राजा साहब ने इस आधार पर एक मशहूर किताब लिखी जो शायद बाद में अपडेट होती रही। इसका नाम था- ज़ीज-ए-मोहम्मद शाही। इसमें उन्होंने विदेशी डेटा और भारतीय- इस्लामी खगोल विज्ञान की रीडिंग लेकर काफी हद तक सटीक पंचांग बनाया। इसे मुगल दरबार मानता था। लोगों ने भी माना। इस कमाल के प्रयोग पर विदेशी यात्री नज़र रखते थे इसलिए जब भारत आए तो जंतर मंतर जाते थे। रहस्य, विज्ञान और इतिहास से ओतप्रोत जंतर मंतर पर अनीशा शेखर मुखर्जी ने एक किताब लिखी थी। दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर और यूके की डीमॉन्ट फ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी पढ़ाई लिखाई हुई है। लाल किले पर पहले एक खूबसूरत किताब लिख चुकी हैं। कभी हाथ लगे तो उनकी किताब पढ़िएगा। हमने पढ़ाकू नितिन में एक पॉडकास्ट किया है। वो पब्लिश हो चुका। वही देखिएगा। फिलहाल तो जंतर मंतर की उपेक्षा का भारी दुख है। हम अपनी बेशकीमती इमारतों का ब्यूटीफिकेशन करते हैं मगर रीस्टोरेशन नहीं।
#इतिइतिहास
"मैं, जो बहुत बेसब्र हूँ, उनसे पहले ही जा रहा हूँ।"
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22 फरवरी 1942 की रात ब्राज़ील के एक शांत पहाड़ी कस्बे में जब स्टीफन ज़्विग और उनकी पत्नी लोटे ने नींद की गोलियों का ओवरडोज़ लिया तब वो अपने ज़हन में बहुत हद तक सारे सवालों से मुक्त थे। उस रात बीसवीं सदी के उस पूरे विचार की मौत हो गई थी जिसने यूरोप को कला, दर्शन और उदारता का केंद्र माना था।
ज़्विग को शायद आप में से कुछ ने पढ़ा हो, कुछ ने मेरी तरह देर से खोजा हो। मुझे उनका नाम पहली बार पता चला था जब एक शानदार फिल्म खत्म हुई और अंत में डायरेक्टर ने उन्हें याद करते हुए कुछ लाइनें लिखीं।
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ज़्विग विश्वयुद्धों के दौर में दुनिया के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक थे। वियना के एक संपन्न यहूदी परिवार में पले-बढ़े ज़्विग की आँखों ने उस यूरोप को देखा था जो बिना पासपोर्ट की खुली सीमाओं, वियना के मशहूर कैफ़े-हाउसों में चलने वाले दार्शनिक विमर्शों और एक साझा महाद्वीपीय सभ्यता का सपना जी रहा था। ज़्विग ने अपनी आत्मकथा 'द वर्ल्ड ऑफ यस्टरडे' में इसे 'सुरक्षा का स्वर्णिम युग' कहा था। विडंबना देखिए इसी आत्मकथा की कॉपी प्रकाशक को डाक से भेजने के ठीक 24 घंटे बाद ज़्विग ने अपनी पत्नी का हाथ थामे यह दुनिया छोड़ दी।
फ्रायड, गुस्ताव महलर और रिल्के जैसे दिग्गजों के समकालीन ज़्विग 1920-30 के दशक में जर्मन भाषियों और पूरे यूरोप में एक सेलिब्रिटी की तरह पढ़े जा रहे थे। 'Beware of Pity' और 'Letter from an Unknown Woman' जैसी उनकी किताबों के अनुवाद दुनिया भर में हिट थे। मगर समय बदला। 1914 के पहले विश्व युद्ध और फिर 1930 के दशक में उभरे नाज़ीवाद ने उस परिष्कृत दुनिया को चंद बरसों में रौंद डाला।
जिस वियना को ज़्विग अपनी आत्मा मानते थे वहाँ उनकी किताबें जलाई जाने लगीं। 10 मई 1933 को हिटलर के प्रोपेगैंडा मंत्री गोयबल्स के आदेश पर उन्मादी नाज़ी छात्रों ने चौराहों पर उन किताबों को जलाया जिन्हें वे 'अन-जर्मन' मानते थे। इसमें फ्रायड, मार्क्स, आइंस्टीन और थॉमस मान के साथ ज़्विग की किताबों भी थीं। उनकी किताबों की छपाई पर पाबंदी लग गई। प्रकाशकों पर दबाव बनाकर अनुबंध रद्द कराए गए।
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अराजनैतिक स्वभाव के ज़्विग पहले विश्व युद्ध के बाद से वियना छोड़कर साल्ज़बर्ग में एक पहाड़ी पर बने अपने सुंदर घर में रहने चले गए थे। 1934 के फरवरी में ऑस्ट्रियाई गृहयुद्ध के दौरान एक दिन पुलिस ज़्विग के घर में घुस आई। झूठा शक जताया गया कि उन्होंने घर में वामपंथी मिलिशिया के हथियार छुपा रखे हैं। तलाशी में कुछ नहीं मिला, लेकिन एक विश्वप्रसिद्ध, शांतिप्रिय लेखक के घर में पुलिस का इस तरह अपमानजनक ढंग से घुसना यह बता गया कि अब मुल्क में न कानून का राज बचा है, न नागरिक गरिमा। आहत होकर ज़्विग लंदन चले गए। 1938 में जब हिटलर ने ऑस्ट्रिया का विलय किया तो ज़्विग का पासपोर्ट रद्द हो गया। वो स्टेटलेस हो गए। ब्रिटेन में रिफ्यूजी कार्ड लेना पड़ा। युद्ध छिड़ते ही जर्मनों पर शक़ गहराने लगा तो वे पहले अमेरिका और फिर 1941 में ब्राज़ील में शरण पाए।
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फरवरी 1942 में नाज़ी अजेय लग रहे थे। 60 साल के ज़्विग की हिम्मत अब टूटने लगी थी।
22 फरवरी 1942 को रविवार था। पेट्रोपोलिस के अपने छोटे से किराए के बंगले में ज़्विग ने आत्मीयजनों को खत लिखने के बा पुर्तगाली में “घोषणा” शब्द लिखकर जर्मन में अपना अंतिम सुसाइड नोट टेबल के बीचों-बीच रखा।
रात करीब 9 से 10 बजे के बीच ज़्विग और लोटे ने अपने बेडरूम का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। लंबे वक्त से जमा की गई नींद की गोलियों का घोल पहले 60 साल के ज़्विग ने पिया और अचेत हो गए। फिर 33 साल की लोटे ने भी उतनी ही खुराक ले ली। रिपोर्ट कहती हैं कि ज़्विग ने लोटे से जीने का आग्रह किया था, मगर वे ज़्विग के बिना इस उजड़ी दुनिया में रहने को तैयार नहीं थीं।
अगली सुबह नाश्ते के लिए जब नौकरानी ने दरवाज़ा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। सुबह दस बजे तक कोई हलचल न होने पर पुलिस बुलाई गई और दरवाज़ा तोड़ा गया।
अंदर संघर्ष या तड़प का कोई निशान नहीं था। हर चीज़ अपनी जगह पर करीने से रखी थी। ज़्विग जा चुके थे। उनके लिखे नोट की कुछ लाइनें साफ चमक रही थीं- मैं अपने मित्रों को सलाम करता हूँ! काश वो आनेवाली भोर देख सकें! मैं, जो बेसब्र हूँ, पहले जा रहा हूँ।"
ज़्विग का जाना यह सबक छोड़ गया कि सभ्यताएँ और लोकतंत्र कोई अमर शिलालेख नहीं हैं जिन्हें कभी खरोंच न आए। जिस शिष्टाचार और आज़ादी को हम बहुत सहज मान बैठते हैं, अगर उनकी हिफ़ाज़त न की जाए तो वे नफ़रत के एक ही झोंके में तिनकों की तरह बिखर सकते हैं।अफसोस कि जिस भोर से पहले वो बेसब्र होकर चले गए, वो कुछ ही साल बाद आ गई थी।
#इतिइतिहास
(फोटो- ज़्विग का अंतिम नोट)
ना इस्तेमाल करने से इंसान की पूंछ मिट गई, मुझे डर है एनसीआर वालों की कार से इंडिकेटर ना गायब हो जाएं।
फाहियान ने जो देखा वो 1627 साल पुराना भारत था। पता नहीं कब कागज़ पत्तर की अंग्रेज़ी गुलामी हमें सभ्य लगने लगी। अब नागरिक स्वतंत्रता भी सिर्फ़ कागज़ में है। उसे हरने के दुनिया भर की हुकूमतों के पास पचास बहाने हैं।
ये जितेंद्रनाथ सान्याल ने लिखा था. वही जिन्होंने भगत सिंह के साथ संघर्ष किया. किसी वक्त क्रांतिकारियों की बाइबिल रही “बंदी जीवन” लिखनेवाले शचींद्रनाथ सान्याल और काकोरी में सज़ा काटनेवाले भूपेंद्रनाथ सान्याल के भाई. सान्याल बंधुओं के बारे में थोड़ा पढ़िए.
#इतिइतिहास
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में खींची गई अंतिम फोटो।
सादेपन, दृढ़ता, ईमानदारी और कर्मठता के प्रतीक शास्त्री जी को जयंती पर कोटि कोटि प्रणाम!! 🙏🙏🙏
गांधी के राष्ट्रपिता होने पर बड़े सवाल किए जा रहे हैं। कोई राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता है भला???
शब्दज्ञान के जुगनुओं, हो तो राष्ट्र का पति भी नहीं सकता लेकिन है। राष्ट्र कभी देश नहीं होता। ये नेशन स्टेट है। नेशन स्टेट में सबकुछ हो सकता है। पति भी पिता भी। जिस दुनिया से ये अवधारणाएं फैली हैं ये पद और पदवी भी वहीं से आए हैं। काश कि तुमने पॉलिटिकल साइंस पढ़ा होता, काश कि तुम्हारा लेनादेना इतिहास से होता, काश कि तुम नफरत हटाकर वाकई प्रश्न का उत्तर खोजने निकलते।
चीन पर पॉडकास्ट की तैयारी में फाहियान को पढ़ रहा था तो कल रात कुछ लिखकर पोस्ट किया। थोड़ा मन हुआ कि सबको बताऊं फाहियान ने पाटलिपुत्र में क्या देखा। पाटलिपुत्र आज के पटना से दूर नहीं है। यहां फाहियान ने बहुत चीज़ों के अलावा एक ऐसे अस्पताल का ज़िक्र किया जो रोगियों की मुफ्त सेवा में लगा था। हाल फिलहाल इसके खंडहर कुम्हरार में पाए जा सकते हैं। गूगल पर बेशुमार फोटो पड़ी हैं। पटना वालों के लिए ये कोई हैरत वाली बात नहीं लेकिन बहुत लोग हैं जिन्हें ये नहीं मालूम।
1912-15 में कुम्हरार में खुदाई हुई थी तो वो सब मिला जिसके बारे में फाहियान ने लिखा था। मेरी पिछली पोस्ट के नीचे कमेंट में एक सज्जन ने पूछा था कि मठ मिले, अस्पताल मिले, स्तूप मिले लेकिन महल नहीं मिले क्या, वो ईंट के नहीं बनते थे? तो उसका जवाब है कि मिले और ऐसे मिले कि दुनिया का माथा हिल गया।
यहां 80 खंभों वाला अशोक का बनवाया भव्य सभागार मिला। हर खंभे की ऊंचाई 32 फीट थी। दस पंक्तियों में आठ आठ खंभे खड़े किए गए थे। इन पर शीशे जैसी चिकनी पॉलिश थी जिसे 650 साल बाद भी फाहियान महसूस कर सकता था। इन खंभों को धंसने से बचाने के लिए साल की लकड़ी के बड़े-बड़े चौखटे नीचे बिछाए गए। सभागार की छत और फर्श लकड़ी के थे। जब करीब सौ साल पहले खुदाई चली तो इन सब चीज़ों के साथ राख और कोयले की मोटी परत मिली। पुरातत्वविदों ने माना कि ये भव्य इमारत किसी अग्निकांड में खाक हुई थी। आग के ताप से बलुआ पत्थर के खंभे टुकड़ों में बिखर कर फैल गए।
ऐसा नहीं कि इस महल और सभागार का पता बस चीनी यात्री फाहियान देता हो। उसके 700 साल पहले मेगस्थनीज़ जब अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य के समय आया था तब उसने यहां लकड़ी का प्रासाद देखा था। उसने लिखा कि भारतीय राजप्रासाद ईरान के हखामनी साम्राज्य के विख्यात महलों से ज़्यादा सुंदर और प्रभावित करनेवाले थे। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त मौर्य के महल का वर्णन किया है वो लकड़ी का बना था। पटना के ही बुलंदीबाग जो कुम्रहार से थोड़ी दूरी पर है वहां की खुदाई में लकड़ी की विशाल चारदीवारी, लकड़ी के नाले और सुरक्षा प्राचीर के अवशेष मिले हैं।
चंद्रगुप्त वाले लकड़ी के महल को बाद में अशोक ने बड़ा और खूबसूरत बनवा दिया जहां श्रीलंकाई परंपरा और इतिहास के मुताबिक तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। ये बहुत बड़ी घटना थी जिसे आज सिलेबस में पढ़ाते हैं। इसके बाद मैंने आपको बताया कि इस इमारत को फाहियान ने देखा जब इसका असर खत्म होने की तरफ था।
उसके भी करीब सवा दो सौ साल बाद ह्वेनसांग आया तब तक पाटलिपुत्र का पतन हो चुका था और सत्ता कन्नौज जा चुकी थी। ह्वेनसांग की किताब कहती है कि पाटलिपुत्र का पुराना नगर वीरान हो गया। अशोक का ऐतिहासिक प्रासाद और सभागार खंडहरों के ढेर में तब्दील हो गए। बड़े पैमाने पर यहां कमरे या रहने की जगह का ना मिलना सवाल खड़े करता है मगर पुरातत्वविदों का कहना है कि मौर्य काल में रिहायशी महल बहुमंजिला और अधिकतर साल और शीशम की नक्काशीदार लकड़ी से बनते थे। पत्थर का इस्तेमाल मुख्य रूप से विशाल खंभों और सार्वजनिक स्मारकों में हुआ। आगजनी और गंगा- सोन की बाढ़ के कारण लकड़ी का पूरा रिहायशी ढांचा सदियों पहले नष्ट हो गया था।
उसी कुम्हरार परिसर में ऊपर की परतों से गुप्त काल का आरोग्य विहार और धन्वन्तरि नाम खुदा हुआ पात्र मिला जिसकी बात मैंने पिछली पोस्ट में की। इससे ये साबित हुआ कि भले अशोक का सभागार खत्म हो गया पर उस जगह के आसपास गतिविधियाँ होती रहीं।
एक दिलचस्प बात और। दिव्यावदान और अशोकावदान नाम के बौद्ध संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख है कि अशोक ने अपने शासनकाल में यक्षों की मदद से पाटलिपुत्र में एक अद्भुत प्रासाद और 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था। यही लोक मान्यता फाहियान के कानों तक पहुंची और इसीलिए उसने अपनी किताब में कहा कि अशोक का ये सभागार देवदूतों ने बनाया, इंसानों के बस का नहीं था।
तस्वीर में खुदाई के दौरान निकला सभागार का खंडहर।
#इतिइतिहास
आज फाहियान की किताब फ़ो-क्यो-की (हिंदी में उपलब्ध) पढ़ रहा था। करीब सोलह सौ साल पहले चीन से आया ये बौद्ध भिक्षु जब भारत की सड़कों पर घूम रहा था तो उसने जो कुछ देखा उसे अपनी डायरी में दर्ज किया। कुछ विद्वानों का मत है कि वो रोज़ नहीं लिखता था बल्कि बाद में अपनी याददाश्त के आधार पर लिखता था, और इसीलिए कई बार भूल भाल भी जाता था। फाहियान बौद्ध भिक्षु था और चीन से चला था ताकि विनयपिटक की एक प्रति भारत से लेकर लौट सके। बौद्ध धर्म के आधारभूत ग्रंथ त्रिपिटक में से एक है विनयपिटक।
फाहियान जिस वक्त यहां आया तब गुप्त वंश के राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का राज था। उन्होंने 375 से 415 ई में शासन किया। ये वही राजा हैं जिनके दरबार में नवरत्न थे- अभिज्ञानशाकुंतलम, मेघदूत और रघुवंश जैसी अमर कृतियां लिखनेवाले कालिदास, आयुर्वेद और शल्य चिकित्सा के महान आचार्य धन्वंतरि, बृहत्संहिता लिखनेवाले खगोलशास्त्री वराहमिहिर, संस्कृत के पहले सुव्यवस्थित शब्दकोश अमरकोश के रचयिता अमर सिंह। कुल मिलाकर भारतीय इतिहासकार इस कालखंड को “स्वर्णयुग” लिखते हैं।
चंद्रगुप्त द्वितीय के राजकाज में धार्मिक भेदभाव नहीं था। वो खुद विष्णु के परम भक्त थे और परमभागवत की उपाधि धारण करते थे। कुतुब मीनार परिसर में खड़ा जंग रहित महरौली का लौह स्तंभ उन्हीं के काल का माना जाता है, जिस पर चंद्र नाम खुदा है और जो भगवान विष्णु को समर्पित था। अभी हाल में स्वप्ना लिडिल के साथ पढ़ाकू नितिन पॉडकास्ट में उसका ज़िक्र भी हुआ था।
चंद्रगुप्त का अपना सेनापति आम्रकार्दव बौद्ध था। मुख्य विदेश और गृह मंत्री वीरसेन 'साब' एक शैव था। राज्य में बौद्ध मठों और हिंदू मंदिरों दोनों को बराबर दान और सुरक्षा मिलती थी। हालांकि फाहियान ने अपने विवरण में राजा का नाम साफ साफ नहीं लिखा लेकिन कई बातों में एक बात ने मुझे पोस्ट लिखने को मजबूर किया। हो सकता है इस बारे में पटना के लोग जानते हों लेकिन बाकी नहीं।
उसने बताया कि शहर के रईसों ने वहां एक मुफ्त अस्पताल खोल रखा था। गरीब, अनाथ, लाचार या बाहर से आए किसी भी बीमार व्यक्ति का वहां मुफ्त इलाज होता था, खाना मिलता था और ठीक होने तक रहने की पूरी छूट थी। सालों साल कई इतिहासकार इसे सिर्फ एक यात्री की बढ़ा चढ़ाकर लिखी बात मानते रहे। उन्हें लगता था कि इतने पुराने जमाने में ऐसा सरकारी या सामाजिक अस्पताल कैसे हो सकता है लेकिन जमीन बहुत दिनों तक सच नहीं छिपाती।
1950 के दशक में जब पटना के कुम्रहार में खुदाई हुई तो मिट्टी के नीचे से पकी ईंटों के कमरे निकले। साथ में मिट्टी की एक सील मिली, जिस पर पुरानी लिपि में लिखा था- श्री आरोग्य विहारे भिक्षु संघस्य। यानी वो सचमुच बौद्ध भिक्षुओं द्वारा चलाया जाने वाला एक अस्पताल (आरोग्य विहार) ही था।
वहां मिट्टी के एक बर्तन का टुकड़ा भी मिला, जिस पर लिखा था- धन्वन्तरेः। यानी धन्वंतरि के नाम से जुड़ा हुआ जो उसी दौर के सबसे बड़े वैद्य थे। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये पात्र या तो चंद्रगुप्त के नवरत्न धन्वंतरि के नाम या उपाधि से संबंधित था या फिर इस अस्पताल के मुख्य औषधालय को उनके नाम पर समर्पित किया गया था। वैसे धन्वंतरि चिकित्सा के देवता भी माने जाते हैं।
सोचकर अच्छा लगता है कि जिस जमाने में दुनिया में अस्पतालों की कोई खास समझ नहीं थी, उस दौर में हमारे यहां साफ सफाई, पानी की निकासी और हर इंसान के मुफ्त इलाज का एक पूरा सिस्टम जमीन पर चल रहा था। फोटो उसी अस्पताल के खंडहरों की है।
कभी समय हो तो मेगस्थनीज़ (करीब 300 ईसा पूर्व), फाहियान (करीब 400 ईस्वी) और ह्वेनसांग (करीब 630 ईस्वी) के यात्रा विवरणों को पढ़िए। करीब एक हज़ार साल का बदलता भारत दिखेगा, साथ में दिखेगा पाटलिपुत्र भी। आपको दुख होगा कि चीज़ें सिर्फ बदतर ही होता गईं।
#इतिइतिहास
सस्ते में लगा देंगे बाऊ जी.. आओ तो सही..
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इंस्टाग्राम पर रील दिख जाती हैं जिसमें कोई ना कोई विद्वान पांच किताबें बता रहा है.. कभी पॉलिटिक्स समझने के लिए, कभी इंटरनेशनल अफेयर्स और कभी इकोनॉमी। मैं सारी सेव कर रहा हूं। इस जन्म में खरीद लूंगा। फिर अगले में उम्मीद है पढ़ भी लूंगा।
कोई दिन नहीं जाता जब नोएडा में बिना नंबर प्लेट की कार नहीं दिखती हैं।
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गुड़गांव में महिला बाइकर को टक्कर मारकर भाग निकलनेवाला आदमी सबको बुरा लग रहा है लेकिन नोएडा में बिना नंबर लगाए दनदनाती कारें किसी को अभी दिख नहीं रहीं। किसी ऐसी ही घटना के होने का इंतज़ार है क्या? हर आदमी कैमरा लगाकर निकलता भी नहीं है। नोएडा ट्रैफिक पुलिस ने ऐसी क्या व्यवस्था बना रखी हैं कि बिना पिछली नंबर प्लेट लगाए दौड़ रही कारों की पहचान हो सके? यदि कोई तरीका हो तो आम इंसानों को भी शेयर करें।












