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“Advocate | Lucknow High Court | Helping people with Legal Solutions & UP Politics Analysis | Justice, Reform & Truth | DM for Consultations”

High Court ( Lucknow )
Joined January 2016
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#मॉडल_पोलिस_ऐक्ट_2006 से क्यों डरती है देश की सरकार ? #1861__अंग्रेज़ी_पोलिस_क़ानून देश के लिए एक अभिशाप ? नही इच्छाशक्ति ,न कोई सरोकार बस जुमलेबाज सरकार और कमजोर समाज 😡 #मॉडल_पोलिस_ऐक्ट_2006 लागू करें .@PMOIndia @HMOIndia @narendramodi @AmitShah
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लखनऊ यूपी मे रिजिम चेंज के लिये हिंसा की तो सरकारी नौकरी से होंगे दूर यूपी मे आवेदको के चरित्र सत्यापन को लेकर नीति और सख्त की विभागों, निगमो, परिषद और स्थानीय निकायों मे सीधी भर्ती के तहत चयन मे चरित्र सत्यापन पर सख़्ती राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी को नहीं माना जायेगा अयोग्य नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम देवराज की ओर से जारी किया निर्देश केवल एफआईआर दर्ज होने या जाँच लंबित रहने से अभ्यर्थी स्वतः अयोग्य नहीं माना जायेगा पहले से सरकारी सेवा मे कार्यरत कर्मचारियों का नहीं होगा सत्यापन पिछले विभाग से ली जा सकती है जानकारी पुलिस को 30 दिन के भीतर देनी होगी सत्यापन रिपोर्ट!
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विवाह के दौरान अगर पति-पत्नी का एक-दूसरे से संपर्क था, तो केवल DNA टेस्ट से पितृत्व को चुनौती नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के DGP को निर्देश दिया है कि पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में आपराधिक मामले की पूरी मौजूदा स्थिति दर्ज की जाए। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में केवल क्राइम नंबर या चार्जशीट का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। यह भी बताना होगा कि अदालत ने संज्ञान लिया है या नहीं, क्लोजर रिपोर्ट पर क्या आदेश हुआ और मुकदमे की स्थिति क्या है। याचिकाकर्ता का पासपोर्ट री-इश्यू आवेदन लंबित होने पर कोर्ट ने संबंधित क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के छह सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। साथ ही, यूपी DGP से आवश्यक बदलावों का अनुपालन हलफनामा मांगा है। मामले में अगली सुनवाई 4 नवंबर को होगी। 📌CASE: Suresh Yadav @ Geeta Saran Yadav vs. Union Of India And 6 Others इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के DGP को निर्देश दिया है कि पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में आपराधिक मामले की पूरी मौजूदा स्थिति दर्ज की जाए। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में केवल क्राइम नंबर या चार्जशीट का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। यह भी बताना होगा कि अदालत ने संज्ञान लिया है या नहीं, क्लोजर रिपोर्ट पर क्या आदेश हुआ और मुकदमे की स्थिति क्या है।
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और जिन्होंने ये #रायता फैलाया, उन #जस्टिस_साहब पर क्या #कार्यवाही होगी?🤔 । । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिसर में नारेबाजी कर न्यायिक कार्यवाही बाधित करने पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने घटना में शामिल अधिवक्ताओं की पहचान कर उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मामला उप्र बार काउंसिल को भेजने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने देवेंद्र कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। सुनवाई के समय कोर्ट के बाहर कॉरिडोर में कुछ अधिवक्ताओं ने नारेबाजी शुरू कर दी, जिससे न्यायिक कार्यवाही बाधित हुई। कोर्ट ने इस आचरण को अनुचित और घोर अवमाननापूर्ण करार दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दूरदराज से आने वाले गरीब वादकारी न्याय पाने की उम्मीद में हाईकोर्ट पहुंचते हैं। किसी अधिवक्ता को किसी न्यायालय से शिकायत होने पर भी दूसरे न्यायालयों के बाहर नारेबाजी करने, कार्यवाही बाधित करने या अदालत को डराने-धमकाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने रजिस्ट्रार प्रोटोकॉल को सीसीटीवी फुटेज हासिल कर संबंधित अधिवक्ताओं की पहचान करने और अगली सुनवाई तक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया। #वकील से कथित #दुर्व्यवहार के बाद भड़का विवाद, विवाद मंगलवार को #न्यायमूर्ति #अजय_भनोट की अदालत में एक अधिवक्ता के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों के बाद बढ़ा। बार असोसिएशन ने आरोप लगाया था कि न्यायाधीश ने अधिवक्ता को #फटकार लगाई, #जेल भेजने की #धमकी दी और पुलिस अधीक्षक से #माफी मांगने को कहा। इसके बाद बुधवार को #अधिवक्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। बवाल के कारण मुख्य न्यायाधीश की अदालत में भी करीब एक घंटे तक कामकाज प्रभावित रहा। कोर्ट नंबर 55 में भी बुधवार को अधिवक्ताओं के शोर-शराबे से सुनवाई बाधित हुई। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान आनंद प्रकाश की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। कोर्ट के बाहर नारेबाजी के कारण कार्यवाही आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया। आवेदक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने परिस्थितियों को देखते हुए सुनवाई स्थगित करने की अपील की। न्यायालय ने कहा कि वादकारियों के हित में अदालत का सुचारु संचालन सुनिश्चित करना बार के सदस्यों की जिम्मेदारी है। इसके बाद मामले की सुनवाई पांच नवंबर तक स्थगित कर दी गई। कोर्ट ने आदेश की प्रति रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश भी दिया।
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बीजेपी अपने हर गढ़ में शिकस्त पा रही है !
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"परिवारवाद" शब्द का इस्तेमाल करनेवाले अपना इतिहास पहले देख लें !
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आकाश आनंद जी का सक्रिय राजनीति में स्वागत है !
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@Nation27Digital को धन्यवाद मंच के लिए 💐
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वकीलों ने जस्टिस अजय भनोट की कोर्ट में जमकर तोड़फोड़ भी की और गालियाँ भी दी… जस्टिस जे जे मुनीर ने एक बार अपनी कोर्ट में ऐसे ही हालत पर एक तंज कसा था कि ‘कोर्ट में दो ही साहब होते हैं एक जज साहब और एक वकील साहब बाकी सब आरोपी, पीड़ित और गवाह…’ आज की घटना एक सीख है…
इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकीलों का हंगामा, जस्टिस अजय भनोट के कोर्ट रूम नम्बर 41 में वकीलों ने की तोड़फोड़… सुरक्षाबलों ने जस्टिस भनोट को पीछे के दरवाज़े से सुरक्षित बाहर निकाला दो कप्तानों SP सोनभद्र अभिषेक वर्मा और SP संत कबीर नगर संदीप कुमार मीना की पर्सनल अपीयरेंस लगी थी, दोनों कोर्ट रूम छोड़कर निकले…वकीलों की बढ़ती संख्या के साथ कोर्ट परिसर में बवाल बढ़ता हुआ!!
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के DGP को निर्देश दिया है कि पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट में आपराधिक मामले की पूरी मौजूदा स्थिति दर्ज की जाए। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट में केवल क्राइम नंबर या चार्जशीट का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। यह भी बताना होगा कि अदालत ने संज्ञान लिया है या नहीं, क्लोजर रिपोर्ट पर क्या आदेश हुआ और मुकदमे की स्थिति क्या है। याचिकाकर्ता का पासपोर्ट री-इश्यू आवेदन लंबित होने पर कोर्ट ने संबंधित क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के छह सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। साथ ही, यूपी DGP से आवश्यक बदलावों का अनुपालन हलफनामा मांगा है। मामले में अगली सुनवाई 4 नवंबर को होगी। 📌CASE: Suresh Yadav @ Geeta Saran Yadav vs. Union Of India And 6 Others क्या पुलिस वेरिफिकेशन में ऐसी स्पष्टता पासपोर्ट आवेदकों को अनावश्यक देरी से बचा सकती है? अपनी राय कमेंट में बताएं। #AllahabadHighCourt #Courtverdicts #PassportVerification #LegalNews #IndianJudiciary
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इतना खाया कि बुनियादी सुविधाओं की बेच दिया ! इलेक्टोरल बॉन्ड डेटा (2019-2024) के अनुसार, दवा/हॉस्पिटल फील्ड से बीजेपी को टॉप डोनर: 1. Torrent Pharmaceuticals (~61 करोड़) 2. Aurobindo Pharma (34.5 करोड़) 3. Divi's Laboratories (30 करोड़) 4. Dr Reddy's Labs (~25-27 करोड़) 5. Zydus Healthcare (~27 करोड़) 6. Cipla (~24 करोड़) 7. Sun Pharma (~24.5 करोड़) 8. Mankind Pharma (24 करोड़) 9. Intas Pharmaceuticals (20 करोड़) 10. Yashoda Hospital/Eugia/Natco (~15 करोड़ प्रत्येक) कुल फार्मा सेक्टर से बीजेपी को ~394-420 करोड़ मिला। डेटा ईसीआई/एसबीआई से।
मुस्कराये की आप भारत में हैं ? मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड बेचकर नागरिकों के मूल व्यवस्थाओं को ही बेच दिया ?
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देश और विशेष यूपी में ऐसा कोई नहीं जो परिवारवाद से न जुड़ा हो !
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ऑफिस मेमोरेंडम No. 5888 (27.10.2026) मुख्य न्यायाधीश के 26.10.2026 आदेश पर: 1. कोर्ट परिसर/कार्यवाही के वीडियो-फोटो रिकॉर्ड/शेयर बैन। 2. परिवार/थर्ड पार्टी अकाउंट से संस्थागत सामग्री न फैलाएं। 3. राजनीतिक पोस्ट पूरी तरह प्रतिबंधित (Rule 5 UP Conduct Rules)। 4. सोशल मीडिया मोनेटाइजेशन बैन (Rule 15)। उल्लंघन पर तुरंत अनुशासनात्मक कार्रवाई। आधिकारिक साइट पर उपलब्ध।
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आसाराम बापू पर जीरो FIR में बलात्कार शब्द ही नहीं था! सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता कीर्ति आहूजा जी ने दस्तावेजों के साथ खुलासा किया - दिल्ली में जो शुरुआती FIR हुई थी, उसमें सिर्फ "छेड़छाड़" की बात लिखी थी, 376 का कोई मामला ही नहीं बनता था!
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🔥 EXCLUSIVE INTERVIEW 🔥 सुप्रीम कोर्ट के जजों पर सबसे बड़ा सनसनीखेज खुलासा... न्यूयॉर्क के वकील और एक्टिविस्ट अशोक अरोड़ा ने सुप्रीम कोर्ट की न्यायपालिका के अंदर छिपे Dark Secrets का खुलासा किया है। न्याय के मंदिर में 'बंदरबांट' या जजों का खेल? सुप्रीम कोर्ट के डार्क अंडरबेली से उठे गंभीर सवाल! अशोक अरोड़ा का कहना है कि कॉलेजियम में जजों के चयन के दौरान मेरिट के बजाय आपसी तालमेल और सिफारिशों से "बंदरबांट" होती है। उन्होंने दावा किया कि एक जज रात को 1:00 बजे अपनी महिला इंटर्न को "I Love You" का मैसेज भेजते थे। हाल-फिलहाल में जिस तरह के खुलासे सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए फैसलों को लेकर हो रहे हैं, देश के लिए शर्मिंदगी ही नहीं जिल्लत का मुद्दा है। जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ के सत्ता के सामने नतमस्तक होने की कहानी सामने आ रही है। यह सचेत होने का समय है। सिर्फ जागरूकता से इस मसले का हल नहीं मिलेगा। पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई का ब्लैकमेलिंग का किस्सा अयोध्या के फैसले को ही जमींदोज कर गया था। सत्ता की गोद में नहीं, सत्ता के चरणों में बिछ चुकी है न्यायपालिका। जस्टिस किशन कौल जजों को देवतुल्य ठहरा रहे हैं अपनी किताब में, जिस काम का मेहनताना और सुविधाएं देश का सिस्टम जजों को देता है, वीआईपी होने का सम्मान भी। अगर कोई फैसला सही दे दिया, तो देश पर कोई एहसान नहीं किया है। हर फैसला सही हो, यह जिम्मेदारी है सुप्रीम कोर्ट की। जज का पद भी भीख में पाया जा रहा है, यह आज सार्वजनिक हो चला है। एक भी व्यक्ति उस पद की गरिमा का हत्यारा है जो उस पद के काबिल नहीं है। जज खुद को भगवान समझ बैठे हैं। ऐसे स्वघोषित खुदाओं को घसीट कर सड़क पर खींचने का वक्त आ गया है। चुनाव आयोग ने इलेक्शन का भद्दा मजाक बना दिया है, जो सुप्रीम कोर्ट की कारगुजारियों से ही संभव हुआ है। इंसाफ की शपथ लेकर जज की कुर्सी मिलती है। सभी को मिलकर लोकतंत्र को स्वस्थ रखने के लिए इन जजों के कारनामे और नाम सार्वजनिक करने होंगे। लोकतंत्र चाहिए, तो इतनी जिम्मेदारी प्रत्येक जागरूक नागरिक की बनती है... क्या आप इस मुहिम में योगदान देंगे या लोकतंत्र को सिसक-सिसक कर मरने देंगे?
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क्या आप जानते हैं कि अब लड़की या लड़का गायब हो जाने पर थाने में एफ आई आर दर्ज करवाने के लिए नहीं काटने पड़ेंगे चक्कर। गुमशुदगी के बजाय तुरंत दर्ज होगी एफ आई आर। ### सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश: गुमशुदगी के मामलों में तुरंत FIR दर्ज करना अनिवार्य मामले की पृष्ठभूमि यह मामला मद्रास हाईकोर्ट के 5 मार्च 2025 के आदेश के विरुद्ध दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP Criminal No. 11263/2025) में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मानव तस्करी, लापता बच्चों एवं महिलाओं को खोजने तथा विभिन्न राज्यों की पुलिस और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए गठित समिति की प्रगति रिपोर्ट रखी गई। समिति की पाँच बैठकें हो चुकी थीं और उसके प्रस्तावों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी 10 प्रमुख निर्देश 1. देश के सभी पुलिस थानों को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना। 2. केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को निर्देश दिया गया कि देश के प्रत्येक पुलिस थाने को जोड़ने वाला अखिल भारतीय नेटवर्क तैयार किया जाए। इसमें मानव तस्करी, गुमशुदा बच्चों और महिलाओं के लिए विशेष पोर्टल हो। इस व्यवस्था को निम्न पोर्टलों से जोड़ने का सुझाव स्वीकार किया गया: * Mission Vatsalya * Crime and Criminal Tracking Network System (CCTNS) * मानव तस्करी और गुमशुदगी से संबंधित विशेष मॉड्यूल उद्देश्य: अलग-अलग राज्यों और पुलिस थानों के बीच सूचना साझा करके लापता व्यक्ति का पता शीघ्र लगाना। 2. गुमशुदगी की सूचना मिलते ही FIR दर्ज करना अनिवार्य यह आदेश का सबसे महत्वपूर्ण निर्देश है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि: * किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही पुलिस FIR दर्ज करे। * FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जाँच (Preliminary Enquiry) की प्रतीक्षा न की जाए। * परिवार या अभिभावकों को पहले स्वयं व्यक्ति को खोजने के लिए बाध्य न किया जाए। * पुलिस तत्काल उच्चतम स्तर पर सक्रिय होकर लापता व्यक्ति की तलाश करे। न्यायालय ने शुरुआती कुछ घंटों को “Golden Hours” (स्वर्णिम घंटे) बताया, क्योंकि इस दौरान लापता व्यक्ति को सुरक्षित खोजने की संभावना सबसे अधिक हो सकती है। यदि व्यक्ति 24 घंटे के भीतर मिल जाए, तो आदेश में विशेष व्यवस्था दी गई है कि संबंधित जिले का पुलिस प्रमुख FIR की प्रति क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय को अग्रेषित न करे और मामला उसी स्तर पर बंद किया जा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस 24 घंटे तक कार्रवाई रोके या निष्क्रिय रहे। तलाश तुरंत शुरू होनी चाहिए। FIR में संबंधित आपराधिक धाराएँ शामिल करना:- गुमशुदगी के मामले में दर्ज FIR में तथ्यों के अनुसार निम्नलिखित कानूनों के प्रासंगिक प्रावधान अनिवार्य रूप से शामिल किए जाएँ: * भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) * अपहरण (Kidnapping) से संबंधित प्रावधान * बहला-फुसलाकर ले जाने (Abduction) से संबंधित प्रावधान * मानव तस्करी (Human Trafficking) से संबंधित प्रावधान * अन्य लागू वैधानिक प्रावधान इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गुमशुदगी में सभी धाराएँ स्वतः लगेंगी; FIR में प्रासंगिक प्रावधान मामले के तथ्यों के अनुरूप होने चाहिए। मानव तस्करी की आशंका होने पर विशेष इकाई को मामला सौंपना:- 1. यदि जाँच एजेंसी या पुलिस के पास यह मानने का पर्याप्त कारण हो कि मामला मानव तस्करी से संबंधित है, तो चार महीने की अवधि समाप्त होने की प्रतीक्षा किए बिना मामले को संबंधित विशेष इकाई को हस्तांतरित किया जाए। 2. यह इकाई क्षेत्र में उपलब्ध होने पर मानव तस्करी, अपहरण और संबंधित अपराधों की जाँच करने वाली विशेष इकाई होगी। 3. Anti Human Trafficking Units (AHTUs) को सक्रिय करना सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि देश में कई मानव तस्करी निरोधक इकाइयाँ केवल कागजों पर गठित हैं या उनमें पर्याप्त अधिकार, कर्मचारी और संसाधन नहीं हैं। इसलिए केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया कि वे अपने गृह सचिवों तथा पुलिस महानिदेशकों के माध्यम से सभी AHTUs को चार सप्ताह के भीतर पूरी तरह कार्यशील और प्रभावी बनाएँ। 📢 **कानूनी जानकारी के लिए जुड़े रहे ⚖️ कानून जानें, अपने अधिकार प #SupremeCourt #MissingPerson #FIR #LegalUpdateBySoni #IndianLaw #CCTNS #humantrafficking
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आदेश का तत्काल अनुपालन:- 1. राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ओर से उपस्थित वकीलों को आदेश संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाने और उसका सख्ती से तथा तत्काल पालन सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया गया। 2. व्यक्ति मिलने पर परिवार को तत्काल सुपुर्द करना। 3. जब कोई गुमशुदा व्यक्ति या बच्चा मिल जाए, तो यह सुनिश्चित किया जाए कि उसे बिना अनावश्यक देरी के उसके परिवार को सौंपा जाए। 4. सही परिवार या वैध अभिभावक की पहचान का सत्यापन आवश्यक है। 5. अनावश्यक प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं को सुपुर्दगी में अत्यधिक देरी का बहाना नहीं बनाया जा सकता। 6. यदि यह पाया जाए कि मानव तस्करी में परिवार या अभिभावक की मिलीभगत है, तो पीड़ित को उस परिवार के हवाले नहीं किया जाएगा। 7. ऐसी स्थिति में राज्य की संबंधित एजेंसियों और बाल कल्याण समिति (CWC) को देखभाल एवं संरक्षण की जिम्मेदारी निभानी होगी। 8. बरामद व्यक्ति का आधार सत्यापन। 9. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि गुमशुदा या बचाए गए व्यक्ति के मिलने पर तुरंत आधार सत्यापन कराया जाए अथवा आवश्यकतानुसार आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया अपनाई जाए। 10. इसका उद्देश्य बायोमेट्रिक विवरणों की मदद से व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करना और उसे उसके सही परिवार तक पहुँचाने में सहायता करना है। सत्यापन के लिए उपलब्ध अधिकृत एजेंसी की सहायता ली जा सकती है, ताकि समय नष्ट न हो। जिला बाल संरक्षण इकाइयों और कानूनी सेवा प्राधिकरणों की जिम्मेदारी:- 1. संबंधित जिला बाल संरक्षण इकाइयों (DCPUs) को अपने वैधानिक दायित्वों का तत्परता से पालन करना होगा। साथ ही: * हाईकोर्ट की Juvenile Justice Committees को अनुपालन की निगरानी करने का अनुरोध किया गया। * जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) सहित संबंधित संस्थाओं को आपसी समन्वय और सहयोग करने का निर्देश दिया गया। जन्मस्थान पर आधार कार्ड जारी करने की संभावना 1. संबंधित अधिकारियों को यह जाँचने का निर्देश दिया गया कि माता-पिता या अभिभावकों की स्वैच्छिक सहमति के अधीन जन्मस्थान पर ही आधार कार्ड जारी करना कितना व्यावहारिक है। 2. राज्य सरकारों और पुलिस अधिकारियों के लिए विशेष निर्देश। 3. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में नियुक्त नोडल अधिकारी कई बार अपनी जिम्मेदारी गंभीरता से नहीं निभाते। कुछ अधिकारी बैठकों में स्वयं उपस्थित नहीं होते, अधीनस्थ अधिकारियों को भेज देते हैं या बार-बार बदले जाते हैं, जिससे समन्वय प्रभावित होता है। इसलिए न्यायालय ने निर्देश दिया कि: * प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश के गृह सचिव तथा पुलिस महानिदेशक समिति के लिए सत्यनिष्ठा, क्षमता और संबंधित विषय के अनुभव वाले नोडल अधिकारी नियुक्त करें। * नोडल अधिकारी स्वयं जिम्मेदारी निभाएँ; इस दायित्व को किसी कनिष्ठ या अन्य अधिकारी को नहीं सौंपें। * संबंधित राज्यों की कार्रवाई, रिपोर्ट और सुझाव समिति के संयोजक तथा संबंधित केंद्रीय और राज्य अधिकारियों तक समय पर पहुँचाए जाएँ। आदेश का कानूनी महत्व क्या है? 1. इस आदेश से गुमशुदगी की शिकायतों पर पुलिस की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश प्राप्त होते हैं। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश:- 1. गुमशुदगी की सूचना तुरंत FIR दर्ज करना 2. प्रारंभिक जाँच FIR दर्ज करने से पहले प्रतीक्षा नहीं 3. परिवार की भूमिका परिवार को पहले स्वयं तलाश करने के लिए बाध्य नहीं करना 4. पुलिस कार्रवाई पहले कुछ घंटों में तत्काल तलाश संभावित मानव तस्करी पर्याप्त आधार होने पर विशेष इकाई को मामला सौंपना 5. व्यक्ति की बरामदगी वैध परिवार को बिना अनावश्यक देरी के सौंपना 6. बाल संरक्षण DCPU, CWC और अन्य संबंधित संस्थाओं की सक्रिय भूमिका | क्या इस आदेश के आधार पर राजस्थान में FIR दर्ज कराने की मांग की जा सकती है? हाँ। यदि किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना राजस्थान के किसी पुलिस थाने को दी जाती है, तो इस आदेश के दूसरे निर्देश का हवाला देकर तत्काल FIR दर्ज करने और तलाश शुरू करने की मांग की जा सकती है। विशेष रूप से यदि पुलिस यह कहती है कि पहले 24 घंटे प्रतीक्षा करनी होगी, परिवार स्वयं तलाश करे या पहले प्रारंभिक जाँच होगी, तो इस आदेश की प्रति प्रस्तुत कर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सकता है। ध्यान रहे कि गुमशुदगी की प्रत्येक घटना अपने आप में अपहरण या मानव तस्करी का प्रमाण नहीं होती। संबंधित धाराएँ उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के अनुसार लगाई जाएँगी। सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष:- गुमशुदगी में 24 घंटे इंतजार जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई 2026 के आदेश में सभी पुलिस थानों को निर्देश दिया कि किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलते ही FIR दर्ज की जाए। पुलिस प्रारंभिक जाँच या परिवार द्वारा पहले स्वयं तलाश किए जाने की प्रतीक्षा नहीं कर सकती। शुरुआती घंटों को न्यायालय ने “Golden Hours” बताते हुए तत्काल तलाश पर जोर दिया।
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दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और रिटेलर को मिलने वाली कीमतों के बीच बड़े अंतर पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सवाल किया कि दवा निर्माताओं को फायदा पहुंचाने वाली व्यवस्था पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही। कोर्ट ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की भूमिका पर भी सवाल उठाए। मामले में उदाहरण दिया गया कि कुछ दवाएं रिटेलर को 30 रुपये में मिलती हैं, जबकि उन पर 150 से 200 रुपये तक MRP छपी होती है। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। #SupremeCourt #MedicinePrices #MRP #NPPA #Healthcare #DrugPricing #IndiaNews #PharmaceuticalIndustry
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