also highly contagious is kindness,patience,love, enthusiasm,and a positive attitude Don’t wait to catch it from others Be the carrier

Joined November 2011
भगवान् महर्षि वाल्मीकि : करुणा से उदित काव्य का अमर प्रकाश ! "मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।" भारतीय काव्य परम्परा में यह श्लोक करुणा के छन्दोमय उद्गार का अमर प्रतीक है। तमसा के तट पर क्रौञ्चयुगल के एक पक्षी का वध और उसकी सहचरी का आर्तनाद देखकर भगवान् महर्षि वाल्मीकि का हृदय द्रवित हो उठा। उसी संवेदना से वह वाणी प्रकट हुई, जिसमें अन्याय के प्रति प्रतिकार और प्राणिमात्र के दुःख के प्रति करुणा एक साथ मुखर हुई। आदिकाव्य के उद्भव का यह प्रसंग स्मरण कराता है कि उत्कृष्ट साहित्य की मूलभूमि जीवन के प्रति गहरी संवेदनशीलता है। श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में ब्रह्मा महर्षि को श्रीराम का सम्पूर्ण चरित काव्यबद्ध करने की प्रेरणा देते हैं। इस प्रकार ऋषि की तपःपूत प्रतिभा और दिव्य प्रेरणा के संयोग से रामकथा को ऐसा काव्यरूप प्राप्त हुआ, जिसमें धर्म का गाम्भीर्य और मानवीय अनुभूतियों का माधुर्य साथ प्रवाहित होते हैं। महर्षि की लेखनी में परात्पर ब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का चरित्र सत्य, शील, धैर्य और करुणा का सजीव आलोक बनकर उपस्थित होता है। “रामो विग्रहवान् धर्मः” का उद्घोष इसी चरित्र की अन्तःप्रतिष्ठा को व्यक्त करता है। सीता की अडिग निष्ठा, भरत का निष्काम त्याग, लक्ष्मण की समर्पित सेवा और हनुमान की प्रज्ञापूर्ण भक्ति रामायण को जीवनमूल्यों का अक्षय निधि बनाते हैं। प्रभु श्री राम की लीलाओं में दिखते जीवन के विविध आयामों में साधक अपने जीवन के प्रश्नों को पहचानता है और धर्म के सूक्ष्म स्वरूप पर विचार करना सीखता है। "वाल्मीकि जयन्ती" उसी ऋषिदृष्टि का अभिनन्दन है, जिसने करुणा को काव्य, चरित्र को आदर्श और रामकथा को लोकमङ्गल की अमृतधारा बनाया। इस पावन अवसर पर हमारी वाणी सत्य से सुशोभित हो, हृदय परपीड़ा से द्रवित हो और आचरण मर्यादा से आलोकित हो। भगवान् आद्यकवि महर्षि वाल्मीकि के आविर्भावोत्सव की हार्दिक मङ्गलकामनाएँ। उनके तपःपूत काव्य का प्रकाश समस्त मानवता को करुणा, सदाचार और धर्मनिष्ठा की प्रेरणा देता रहे। #AvdheshananadG_Quotes #AvdheshanandG_Mission #वाल्मीकि_जयन्ती #श्रीमद्बाल्मिकीय_रामायण – at New Delhi, India
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।। माण्डूक्योपनिषद् ।। एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ।। ६।। माण्डूक्योपनिषद् का यह षष्ठ मन्त्र प्राज्ञ के विवेचन को समष्टिगत कारणस्वरूप में विस्तार देता है। पूर्व मन्त्र में सुषुप्ति की अविभक्त स्थिति का निरूपण हुआ; अब उसी आत्मतत्त्व का सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, अन्तर्यामी और समस्त जगत् के कारण के रूप में उपदेश है। बार-बार प्रयुक्त ‘एष’ आत्मा और विश्वाधार की अनन्यता का स्मरण कराता है। अपने भीतर जिस सत्य का अनुसन्धान आरम्भ हुआ था, वही समस्त अस्तित्व का आश्रय है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य की दृष्टि में यहाँ निद्रित व्यक्ति के मन को सर्वज्ञ नहीं कहा गया है। जीव का सीमित अनुभव और ईश्वर की समष्टिगत कारणता उपाधियों की दृष्टि से भिन्न हैं। उनका अभेद आत्मस्वरूप में है। व्यक्तिगत अज्ञान ईश्वर की सर्वज्ञता नहीं बन जाता और आत्मज्ञान से सीमित बुद्धि को प्रत्येक लौकिक विषय का ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता। मन्त्र अहंकार के विस्तार के स्थान पर आत्मा की उपाधिरहित अनन्यता का मार्ग प्रशस्त करता है। ‘सर्वेश्वर’ समस्त जगत् के अधिष्ठाता का निर्देश है। देवता, प्राणी, प्रकृति और कर्मफल का समस्त व्यवहार उसी के आश्रय में सम्भव है। ईश्वर विश्व में स्थित कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं, विश्वव्यवस्था का अन्तरंग कारण है। ‘सर्वज्ञ’ इसी समग्रता का ज्ञानात्मक पक्ष प्रकट करता है। जीव साधनों द्वारा क्रमशः जानता है; ईश्वर के समष्टिगत ज्ञान से पृथक् कोई स्वतन्त्र विषयक्षेत्र नहीं है। ‘अन्तर्यामी’ उस सत्ता का बोध कराता है, जो सबके अन्तरतम में स्थित होकर नियमन करती है। यहाँ भीतर होना किसी शारीरिक स्थान में सीमित होना नहीं है। बृहदारण्यक का अन्तर्यामी-ब्राह्मण पृथ्वी, प्राण और अन्तःकरण सहित समस्त अनुभवव्यवस्था के अन्तरंग आत्माधार का उपदेश करता है। वही स्वयं दृश्य हुए बिना दर्शन का आधार है। अन्तर्यामी का स्मरण साधक को विनय और उत्तरदायित्व देता है; अपनी प्रत्येक इच्छा को दैवी प्रेरणा मान लेने के स्थान पर वह राग, भय और अहंकार का विवेक करता है। ‘योनिः सर्वस्य’ ईश्वर की सर्वकारणता प्रतिपादित करता है। सामान्य निर्माण में निर्माता और सामग्री अलग होते हैं; अद्वैत में ब्रह्म से बाहर कोई स्वतन्त्र सामग्री स्वीकार नहीं की जाती। जगत् की उत्पत्ति का नियामक और उसकी सत्ता का आधार उसी ब्रह्म में समझाया जाता है। नामरूप अपने अधिष्ठान से अनन्य हैं। तथापि इसका अर्थ ब्रह्म का किसी पदार्थ की भाँति विकृत होकर जगत् बन जाना नहीं है। मायाशक्ति के सम्बन्ध से सृष्टि का विवेचन होता है; ब्रह्म का चैतन्यस्वरूप निर्विकार रहता है। ‘प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्’ समस्त भूतों की उत्पत्ति और लय को उसी कारण में प्रतिष्ठित करता है। जो नामरूप प्रकट होते हैं, वे अपने कारण में अव्यक्त भी होते हैं। मुण्डकोपनिषद् का मकड़ी और जाले का दृष्टान्त इसी आश्रयसम्बन्ध को स्पष्ट करता है। नामरूपों का प्राकट्य ब्रह्म का जन्म नहीं और उनका लय ब्रह्म का विनाश नहीं है। समस्त परिवर्तनों का आधार स्वयं परिवर्तन से असंस्पृष्ट है। यहाँ लय और मुक्ति का अन्तर स्मरणीय है। सुषुप्ति अथवा प्रलय में व्यक्त व्यापार शान्त होता है, किन्तु पुनः प्राकट्य का बीज बना रहता है। ज्ञान में आत्मा पर आरोपित बन्धन की भ्रान्ति निवृत्त होती है। इसलिए उपनिषद् कारणस्वरूप के वर्णन पर समाप्त नहीं होता। अगला मन्त्र इसी आत्मा को कारण और कार्य की उपाधियों से रहित तुरीय के रूप में स्पष्ट करेगा। सर्वेश्वर और निर्गुण ब्रह्म दो स्वतन्त्र परम सत्य नहीं हैं। जगत् के सम्बन्ध से कारणत्व का उपदेश है; निरुपाधिक स्वरूप में वही अखण्ड ब्रह्म है। इस मन्त्र की साधना श्रद्धा, समर्पण और आत्मविवेक को एक दिशा देती है। ईश्वरार्पण सीमित कर्तृत्व के अभिमान को शिथिल करता है; शास्त्रविचार आत्मा की नित्य पूर्णता स्पष्ट करता है। साधक धर्मपूर्वक कर्म करते हुए फल के आग्रह को घटाता है और समस्त प्राणियों में उसी अन्तरंग आधार का सम्मान करता है। षष्ठ मन्त्र का हृदय यही है कि अपने आत्मस्वरूप का सत्य और विश्व का परम आधार अभिन्न हैं। इस बोध से संकीर्ण देहाभिमान शिथिल होता है और साधक सर्वात्मभाव से निरुपाधिक ब्रह्मबोध की ओर अग्रसर होता है। #माण्डूक्योपनिषद् #भगवद्पादाचार्य #अद्वैत_वेदान्त #Adi_Shankracharya #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at New Delhi, India
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आश्विन पूर्णिमा को जब चन्द्रमा अपनी षोडश कलाओं से परिपूर्ण होकर उदित होता है, तब सम्पूर्ण प्रकृति अमृत-स्नान करती प्रतीत होती है। भगवान् गीता में कहते हैं, "पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः", मैं ही रसात्मक सोम होकर समस्त औषधियों का पोषण करता हूँ। इसीलिए लोकपरम्परा इस रात्रि खीर को चन्द्रकिरणों में रखकर सुधामय बनाती है। किन्तु वेदान्त की दृष्टि बाह्य चन्द्र पर नहीं ठहरती। श्रुति कहती है - "चन्द्रमा मनसो जातः"। शरद का पूर्ण चन्द्र उस निर्मल, शान्त और पूर्ण मन का प्रतीक है, जिसमें आत्मा का प्रकाश अविकल प्रतिबिम्बित होता है। षोडश कलाओं का रहस्य प्रश्नोपनिषद् खोलता है। महर्षि पिप्पलाद कहते हैं - "इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कलाः प्रभवन्ति", वह षोडशकल पुरुष इसी शरीर के भीतर है। जैसे नदियाँ समुद्र में पहुँचकर अपने नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही ये कलाएँ पुरुष में लीन होती हैं, और तब "स एषोऽकलोऽमृतो भवति", वह अकल और अमृत हो जाता है। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत-आलोक में शरद पूर्णिमा का सन्देश यही है: सकल से अकल की ओर, कलाओं की पूर्णता से कलातीत पूर्णता की ओर। इसी पूर्णिमा की रात्रि परात्पर ब्रह्म श्रीकृष्ण ने व्रज में महारास रचा। रासपञ्चाध्यायी का आरम्भ ही अद्भुत है - "भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ।।" "भगवानपि" का "अपि" बड़ा मार्मिक है: जो आत्माराम और पूर्णकाम हैं, वे भी रमण का संकल्प करते हैं, और वह भी योगमाया का आश्रय लेकर। भाष्यकार भगवत्पाद गीताभाष्य के उपोद्घात में यही कहते हैं कि नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव ईश्वर "स्वमायया देहवानिव जात इव" लोकानुग्रह करते दिखाई देते हैं। उसी क्षण पूर्व दिशा में "अखण्डमण्डल" चन्द्र उदित हुआ, मानो आकाश ने भी अखण्ड ब्रह्म की लीला का स्वागत किया। रास अद्वैत का सबसे मधुर भाष्य है। "कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः। रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया ।।" जितनी गोपियाँ, उतने ही रूप धारण कर आत्माराम प्रभु ने रमण किया। एक ही चैतन्य अनेक में, और अनेक के मध्य वही एक। श्रीशुकदेवजी स्पष्ट कहते हैं - "रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रमः", जैसे बालक अपने ही प्रतिबिम्ब से क्रीड़ा करता है। परीक्षित की शंका का समाधान भी अद्वैतमय है - "गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्। योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक् ।।" जो सबके अन्तर में साक्षी रूप से विचरता है, वही लीला हेतु देहधारी हुआ। अतः रास कामलीला नहीं, कामविजय की लीला है; इसका श्रद्धापूर्वक श्रवण "हृद्रोग" रूपी काम को शीघ्र नष्ट कर परा भक्ति प्रदान करता है। साधक के लिए गोपियाँ उसकी शुद्ध चित्तवृत्तियाँ हैं और मध्य में विराजमान श्रीकृष्ण स्वयं आत्मा। जब प्रत्येक वृत्ति ब्रह्माकार हो जाए, तब अन्तःकरण में महारास होता है और "रसो वै सः" की श्रुति प्रत्यक्ष हो उठती है। भगवत्पाद भगवान् आदि शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी इसी रस को शक्ति के आलोक में देखती है। प्रथम श्लोक ही उद्घोष करता है - "शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्"। रास भी शक्ति और शक्तिमान् के अभेद का नृत्य है। ललितासहस्रनाम अम्बा को "गोविन्दरूपिणी" और "शिवशक्त्यैक्यरूपिणी" कहता है; जो व्रज में गोविन्द हैं, वही श्रीपुर में ललिता हैं। सौन्दर्यलहरी (श्लोक ६३) में माँ के मुखचन्द्र की स्मित-ज्योत्स्ना पीकर चकोरों की चोंचें अतिमधुरता से जड़ हो जाती हैं, और वे स्वाद बदलने हेतु चन्द्रमा की अमृत-लहरी को काँजी समझकर पीते हैं। अर्थात् बाह्य चन्द्र का अमृत भी उस चिदानन्दलहरी के सम्मुख साधारण है। ललितासहस्रनाम अम्बा को "चन्द्रमण्डलमध्यगा" और "सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी" कहता है: साधक के सहस्रार में स्थित अन्तश्चन्द्र से ही सुधा की वर्षा होती है। यही आन्तरिक शरद पूर्णिमा है। लोक में यह "कोजागरी" पूर्णिमा भी कहलाती है, जब श्री लक्ष्मी "को जागर्ति?" पूछती हुई विचरती हैं। गीता इसका गूढ़ उत्तर देती है, "या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।" सच्चा जागरण आत्मजागरण है, और उसी जागृत अन्तःकरण में श्री, आरोग्य और सौभाग्य स्वतः अवतरित होते हैं। अन्तस् को ब्रह्म-रसाभिषिक्त कर आत्म-साक्षात्कार की परम जिज्ञासा, उत्सुकता एवं सत्यानुभूति की तत्परता जगाने वाला, षोडश-कौमुदीय कला युक्त व सुधा सम्पन्न "शरद पूर्णिमा" का दिव्य चन्द्रमा सभी के जीवन में आयुष्य-आरोग्यता, दिव्यता-आरोहण व श्री-सौभाग्य की वृद्धि करे! "शरद पूर्णिमा" की हार्दिक शुभकामनाएँ। #शरद_पूर्णिमा #कोजागरी_पूर्णिमा #महारास #रमणरेती #सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes #Adi_Shankracharya
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EU Election Observers, Human Rights Tribunals, and Pak Opposition parties alleged large-scale irregularities, rigging, Army coercion, and manipulation, but @DrSYQuraishi, who says Indian elections are rigged, found Pakistan elections to be free and fair. You can’t do anything.
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।। माण्डूक्योपनिषद् ।। स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ।। ४।। माण्डूक्योपनिषद् का चतुर्थ मन्त्र स्वप्नावस्था के माध्यम से आत्मविवेक को अन्तर्मुख करता है। जाग्रत् में बाह्य विषयों का अनुभव करने वाला आत्मा स्वप्न की उपाधि से तैजस कहलाता है। शरीर विश्राम में रहता है, किन्तु स्वप्न में यात्रा, संवाद, भय और आनन्द का विस्तृत जगत् उपस्थित हो जाता है। श्रुति इस अनुभव द्वारा साधक को विचार कराती है कि बदलते दृश्य और उनसे सम्बद्ध व्यक्तित्व के परे उसका वास्तविक स्वरूप क्या है। ‘स्वप्नस्थान’ इस पाद के अनुभवक्षेत्र का निर्देश है और ‘अन्तःप्रज्ञ’ अन्तःकरण में प्रकट विषयों के ज्ञान का परिचायक है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य जाग्रत् अनुभवों से संस्कारित मन का उल्लेख करते हैं। अविद्या, कामना और कर्म से प्रेरित मन बाह्य विषयों की तत्काल उपस्थिति के बिना जाग्रत् जैसी प्रतीतियाँ प्रस्तुत करता है। अन्तर्मुखता यहाँ अनुभव की दिशा बताती है; आत्मा किसी भीतरी स्थान में सीमित नहीं होता। ‘तैजस’ नाम इस अन्तःप्रकाशित अनुभव की विशेषता प्रकट करता है। स्वप्न के दृश्यों के लिए बाह्य सूर्य अथवा दीपक अनिवार्य नहीं है। वहाँ प्रकाश और अन्धकार, दोनों ज्ञात होते हैं। अतः ज्ञान का प्रकाश दृश्य ज्योति से भिन्न है। बृहदारण्यक की स्वयंज्योति सम्बन्धी शिक्षा के अनुसार आत्मचैतन्य ही अनुभव का प्रकाशक है। मन की वृत्तियाँ उसी के आश्रय से ज्ञात होती हैं। मन का सूक्ष्म दृश्य-विधान और आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप एक नहीं हैं; तैजस उसी आत्मा का स्वप्नोपाधिसम्बद्ध निरूपण है। ‘प्रविविक्तभुक्’ का अभिप्राय सूक्ष्म, संस्काररूप विषयों का अनुभव करने वाला है। स्वप्न में भोजन, सुख अथवा संकट की प्रतीति हो सकती है, यद्यपि उनके स्थूल विषय वहाँ उपस्थित नहीं होते। इससे स्पष्ट होता है कि अनुभूति की तीव्रता उसके विषय की स्वतन्त्र सत्यता का प्रमाण नहीं है। साधक के लिए यह विवेक आवश्यक है कि सूक्ष्म अनुभूतियों की विलक्षणता को आत्मज्ञान की पूर्णता न मान ले। तैजस के भी सात अंग और उन्नीस मुख कहे गए हैं। भाष्य इस सम्बन्ध में पूर्व मन्त्र का विवेचन लागू करता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त अनुभवव्यवस्था के उन्नीस द्वार हैं। स्वप्न में देखना, सुनना और चलना प्रतीत होता है, किन्तु स्थूल इन्द्रियों का वैसा बाह्य व्यापार आवश्यक नहीं होता। सात अंगों का समष्टिगत संकेत आत्मा की व्यापकता स्मरण कराता है। अवस्था और विषय बदलते हैं; आत्मतत्त्व का विभाजन नहीं होता। स्वप्न का विवेचन जाग्रत् जगत् के प्रति उत्तरदायित्व समाप्त नहीं करता। जाग्रत् व्यवहार में नियम, साझा अनुभव तथा कर्मफल की व्यवस्था मान्य हैं। स्वप्न जागने पर बाधित होता है; दोनों की व्यावहारिक स्थिति समान नहीं है। उनका विचारणीय साम्य तादात्म्य में है। स्वप्न में मनुष्य अपने को किसी सीमित पात्र से अभिन्न मानकर उसके सुख-दुःख भोगता है; जाग्रत् में शरीर और अहंकार के धर्मों को आत्मस्वरूप मान लेता है। श्रुति इसी अध्यास का विवेक कराती है। जागने पर ‘मैंने स्वप्न देखा’ का स्मरण अनुभवकर्ता की निरन्तरता की ओर संकेत करता है। स्वप्न का शरीर, स्थान और घटनाक्रम बदल गया, किन्तु अनुभव का आत्माधार दूसरा नहीं हुआ। साक्षी का निर्देश इसी असंग चैतन्य के लिए है। वह मन के भीतर बैठा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं, मन और उसकी समस्त प्रतीतियों का प्रकाशक आत्मस्वरूप है। स्वप्न में राजा अथवा याचक होने से आत्मा वस्तुतः वैसा नहीं बन जाता। अनुभूत दशाएँ बदलती हैं; उनका ज्ञाता स्वरूपतः निर्विकार रहता है। तैजस ‘द्वितीय पाद’ है, आत्मा का दूसरा पृथक् खण्ड नहीं। जाग्रत् की स्थूलता से स्वप्न की सूक्ष्मता की ओर बढ़ता विवेक अन्ततः दोनों के अधिष्ठान का अनुसन्धान करता है। साधक मन की छवियों, स्मृतियों और आशंकाओं को पहचानकर उनके साथ अनिवार्य तादात्म्य से मुक्त होने का अभ्यास करता है। अन्तर्मुखता की पूर्णता भीतर के दृश्यों में रम जाने में नहीं, उनके प्रकाशक के बोध में है। इसी विवेक में स्वप्न का अध्ययन ब्रह्मविद्या का साधन बनता है और साधक की दृष्टि अनुभवों की विविधता से चैतन्य की अखण्डता की ओर उन्मुख होती है। #माण्डूक्योपनिषद् #भगवद्पादाचार्य #अद्वैत_वेदान्त #Adi_Shankracharya #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at New Delhi, India
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।। माण्डूक्योपनिषद् ।। जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ।। ३।। माण्डूक्योपनिषद् का तृतीय मन्त्र जाग्रत् जीवन को आत्मविवेक का प्रथम आधार बनाता है। पूर्व मन्त्र में आत्मा की ब्रह्मरूपता प्रतिपादित हुई; अब उसी अखण्ड आत्मा का जाग्रत् अवस्था से सम्बद्ध निरूपण वैश्वानर के रूप में होता है। जिस शरीर, मन और सक्रिय व्यक्तित्व को मनुष्य अपना सम्पूर्ण स्वरूप मान लेता है, श्रुति उसके अनुभव का विश्लेषण करती है। ‘जागरितस्थान’ का अर्थ है जिसका अनुभव-व्यवहार जाग्रत् अवस्था में प्रकट होता है। ‘बहिष्प्रज्ञ’ उसकी बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त ज्ञानवृत्ति का परिचायक है। इन्द्रियाँ रूप, शब्द, स्पर्श, रस और गन्ध ग्रहण करती हैं तथा अन्तःकरण उनके अनुभव को व्यवस्थित करता है। यहाँ बहिर्मुखता उपाधिसम्बद्ध प्रज्ञा की विशेषता है; आत्मचैतन्य स्वयं भीतर और बाहर की सीमाओं से परिच्छिन्न नहीं है। इन्द्रियों की सक्रियता और मन की चञ्चलता भी उसी के प्रकाश में ज्ञात होती हैं। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य ‘एकोनविंशतिमुख’ के द्वारा अनुभव और कर्म के उन्नीस द्वार स्पष्ट करते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त इनकी गणना है। ‘मुख’ का आशय विषयग्रहण और व्यवहार के साधन से है। अन्तःकरण संकल्प-विकल्प में मन, निश्चय में बुद्धि, अभिमान में अहंकार और स्मरण में चित्त कहलाता है। इन कार्यभेदों के प्रकाशक आत्मा को उनके परिवर्तन से अभिन्न मान लेना देहात्मबुद्धि का मूल है। ‘सप्ताङ्ग’ पद वैश्वानर के समष्टिस्वरूप का उद्घाटन करता है। छान्दोग्य की वैश्वानरविद्या के अनुसार द्युलोक उसका मस्तक, सूर्य नेत्र, वायु प्राण, आकाश मध्यभाग, जल मूत्राशय अथवा संग्रहस्थान, पृथ्वी चरण और आहवनीय अग्नि मुख हैं। यह विराट् निरूपण साधक को अपने एक शरीर की सीमा से व्यापक आत्मदृष्टि की ओर ले जाता है। इसके द्वारा किसी विशाल भौतिक व्यक्ति की कल्पना अभिप्रेत नहीं; व्यक्ति और विश्व की उपाधियों में आत्मतत्त्व की अनन्यता समझाई जाती है। अपने आत्मा का विवेचन करते हुए विश्व के अंगों का वर्णन इसलिए आता है कि आत्मा को केवल निजी शरीर में सीमित मानने का आग्रह निवृत्त हो। व्यष्टि का अनुभवकर्ता और समष्टिरूप वैश्वानर आत्मतः भिन्न नहीं हैं। उपाधियों के भेद से परिच्छिन्नता प्रतीत होती है। सर्वात्मदृष्टि अहंकार को विश्व का अधिपति नहीं बनाती; वह अहंकार द्वारा आत्मा पर आरोपित निजी सीमा का विवेक करती है। ‘स्थूलभुक्’ जाग्रत् में इन्द्रियगोचर विषयों के अनुभव का निर्देश करता है। यहाँ भोग में सुख के साथ दुःख, अनुकूलता, प्रतिकूलता और सामान्य विषयज्ञान भी सम्मिलित हैं। स्थूलता अनुभव के विषयों की विशेषता है; चैतन्य का कोई स्थूल आकार नहीं होता। आत्मा का भोक्तृत्व भी शरीर और अन्तःकरण की उपाधियों के सम्बन्ध से कहा जाता है। शुद्ध आत्मस्वरूप निर्विकार है। ज्ञात सुख-दुःख को अपनी नित्य पहचान मानने से बन्धन का आग्रह पुष्ट होता है; उनका विवेक आत्मा की असंगता स्पष्ट करता है। इसी दृष्टि से जाग्रत् जीवन का प्रत्येक कर्म साधना का अवसर बनता है। इन्द्रियाँ अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं, बुद्धि निर्णय करती है और शरीर कर्म करता है। इन व्यापारों को आत्मा का अपरिवर्तनशील स्वरूप मान लेना अज्ञान है। विवेक कर्तव्य से विमुख नहीं करता; वह कर्तृत्व के अभिमान को शिथिल करता है। साधक प्रयत्न और उत्तरदायित्व निभाते हुए सफलता तथा असफलता को अपनी आत्मसत्ता का अन्तिम निर्णय नहीं बनने देता। वैश्वानर ‘प्रथम पाद’ है, क्योंकि जाग्रत् का विवेचन आगे के आत्मानुसन्धान का आधार है। अखण्ड आत्मा का कोई चौथाई भाग जाग्रत् में सीमित नहीं होता। ‘पाद’ शिक्षण का विभाग है, आत्मा का वास्तविक खण्ड नहीं। स्वप्न और सुषुप्ति के विवेचन से आगे यही स्पष्ट होगा कि अवस्थाएँ बदलती हैं, उनका अधिष्ठान नहीं। तृतीय मन्त्र साधक को उपकरणों के समूह से अपने स्वरूप का निर्णय करने के स्थान पर उनके प्रकाशक चैतन्य की ओर उन्मुख करता है। शरीर कर्म करे, इन्द्रियाँ संयमित रहें और बुद्धि विवेकशील बने; इन सबके मध्य आत्मा की असंग पूर्णता का बोध जागे। यही जाग्रत् अनुभव से विश्वात्मता की ओर बढ़ती हुई ब्रह्मविद्या की प्रथम प्रतिष्ठा है। #माण्डूक्योपनिषद् #भगवद्पादाचार्य #अद्वैत_वेदान्त #Adi_Shankracharya #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at New Delhi, India
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भारत के माननीय केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं शुभाशीर्वाद। राष्ट्रनिष्ठा, संकल्पशक्ति और कुशल रणनीति से समन्वित आपका सार्वजनिक जीवन राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना, गौरवशाली परम्पराओं और राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रति आपकी प्रतिबद्धता अभिनंदनीय है। सांस्कृतिक विरासत के सम्मान के साथ सशक्त, सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की आपकी संकल्पना राष्ट्र के प्रति आपके गहरे अनुराग को अभिव्यक्त करती है। अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों को निष्प्रभावी करने की संसदीय प्रक्रिया में आपकी प्रमुख भूमिका राष्ट्रीय एकात्मता के प्रति आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति की परिचायक है। सीमाओं की सुरक्षा, अवैध घुसपैठ की रोकथाम तथा आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के आपके प्रयास राष्ट्ररक्षा के प्रति आपकी सजगता दर्शाते हैं। आपका अनुशासन और निर्णयों के प्रति अडिग समर्पण लौह-संकल्प की अनुभूति कराता है। भगवान श्री मृत्युंजय महादेव से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, अक्षय ऊर्जा और दिव्य सामर्थ्य प्रदान करें। आपकी राष्ट्रसेवा भारत की सांस्कृतिक गरिमा, एकता और लोकमंगल को निरंतर समृद्ध करती रहे। सुदिनं सुदिनं जन्मदिनं तव, भवतु मंगलम् जन्मदिनम् || चिरं जीव कुरु पुण्यवर्धनम् , चिरं जीव कुरु कीर्तिवर्धनम् || सुदिनं पुनः पुनः आवर्तताम्।। शुभाशीर्वाद सहित, स्वामी अवधेशानन्द गिरि: @AmitShah
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Marco Rubio - "Amnesty International is a fraud"
🚨 WHO GAVE AMNESTY INTERNATIONAL AMNESTY? Amnesty International has made some of the world’s most explosive conflict claims — and repeatedly faced scrutiny over how those claims were sourced, framed and argued. In Gaza, Amnesty’s accusations of genocide and deliberate starvation were fiercely disputed by Israel. In Ukraine, its 2022 report criticizing Ukrainian forces was immediately weaponized by Russia, while a later independent review raised questions about parts of the report’s legal reasoning and evidentiary basis. Now, journalist @CaitlinDoornbos is raising fresh questions about evidence used to link foreign governments to weapons supplied in Sudan’s war. None of this automatically means Amnesty is wrong every time. But for an organization whose reports can drive headlines, diplomatic pressure and policy, the standard should be simple: Who is scrutinizing the scrutinizer?
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🚨 INDIAN AUSTRALIAN FAMILY LEFT TERRIFIED AFTER ALLEGED RACIST THREATS Read the full story here 🔗👇 theaustraliatoday.com.au/fri… Police allege 19-year-old Harley Adams yelled racist insults and threatened to “blow up” the building. Indian Australian family is considering breaking its lease and returning to India after allegedly being targeted in a racist outburst at a Morningside unit complex. #Brisbane #HateCrime #IndianAustralians #Racism #Queensland #Morningside #Australia @MulticulturalQ @FICQinc @DavidCrisafulli @QldPolice @DrAmitSarwal @Pallavi_Aus @JitarthJai
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INDIAN-AUSTRALIAN FAMILY CONSIDERS RETURNING TO INDIA AFTER RACIST THREATS IN BRISBANE An Indian-Australian family in Brisbane may leave Australia after a late-night racist attack. A 19-year-old allegedly shouted insults and threatened to blow up their unit complex in Morningside. Police charged Harley Adams with hate-crime offences. He appeared in court and was granted bail with strict conditions. The family is now considering breaking their lease and returning to India over safety fears. Video : Queensland Police Service
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SHEETAL DEVI BROKE DOWN IN TEARS AFTER WINNING INDIVIDUAL GOLD! 🇮🇳🥇 SHE IS SO INCREDIBLE!!! 🥹🥹🥹
INDIA’S SHEETAL DEVI IS ASIAN PARA GAMES CHAMPION IN ARCHERY! 🥇🥹 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥
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I know this pic has been posted by others already, but... what on earth @RCPhysicians ?! 😱 #NoMoreManels #DiversityAndInclusion
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Much needed for those who think of changing the regime 😶
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Signs Of Perfect Physical Health - HbA1c <5.5% (ideally ≤5.4%) - Fasting insulin <6 μIU/mL - TG/HDL ratio <1.5 (ideally ≤1.0) - ApoB <80 mg/dL (<60–70) - hs-CRP <1.0 mg/L (ideally <0.5) - ALT preferably <20–25 U/L - Vitamin D 40–60 ng/mL - B12 >500–600 pg/mL - BP comfortably <120/80 - Resting HR 50–60 bpm (or lower) Wake up refreshed - Stable energy all day - Strong, lean body - Healthy waist (WHtR <0.5) - High muscle mass + real strength for your age (You get off the floor easily, carry heavy loads, grip is strong) - Excellent mobility & endurance - Deep sleep 7–9 hours - Clean digestion no frequent bloating/reflux - Recover well after training
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।। माण्डूक्योपनिषद् ।। सर्वं ह्येतद्ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।। २ ।। माण्डूक्योपनिषद् का द्वितीय मन्त्र ब्रह्मविद्या को साधक के अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। प्रथम मन्त्र में ओंकार की सर्वात्मकता कही गई; अब उसी सत्य का उद्घोष है कि यह सम्पूर्ण अस्तित्व ब्रह्म है और यह आत्मा भी ब्रह्म है। जगत् के अधिष्ठान तथा अपने अन्तरतम स्वरूप के बीच कल्पित दूरी इस महावाक्य में निवृत्त होती है। आत्मा की पूर्णता नित्यसिद्ध है; श्रुति उसका बोध कराकर देहात्मबुद्धिजनित अज्ञान का निरसन करती है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य के अनुसार प्रथम मन्त्र में अभिधान अर्थात् ओंकार की प्रधानता थी; द्वितीय में अभिधेय अर्थात् उससे प्रतिपादित तत्त्व की प्रधानता है। इस शिक्षण का प्रयोजन नाम और नामी की अनन्यता समझाकर दोनों के भेदविकल्प का उपशम करना है। वाच्य और वाचक के आश्रय से आरम्भ हुआ विवेक उनके अधिष्ठानभूत ब्रह्म में पर्यवसित होता है। वही ब्रह्म ‘अयमात्मा’ के द्वारा अपने अपरोक्ष आत्मस्वरूप के रूप में निर्दिष्ट है। ‘सर्वं ह्येतद्ब्रह्म’ का अर्थ प्रत्येक परिवर्तनशील आकृति को अविनाशी मान लेना नहीं है। नामरूप बदलते हैं, किन्तु उनकी सत्ता ब्रह्म से पृथक् नहीं है। मिट्टी के पात्र नाम, आकार और उपयोग में भिन्न होते हुए भी मिट्टी से अतिरिक्त द्रव्यसत्ता नहीं रखते। इसी प्रकार जगत् ब्रह्म से अनन्य है। दृष्टान्त आश्रित सत्ता समझाता है; ब्रह्म में वास्तविक परिवर्तन नहीं स्थापित करता। अनेकता व्यवहार में अनुभव होती है, जबकि उसका अधिष्ठान अखण्ड और अद्वितीय है। ‘अयम्’ साधक को सर्वाधिक निकट और स्वतःसिद्ध सत्य की ओर उन्मुख करता है। शरीर, इन्द्रियाँ, विचार, स्मृति और अहंकार अनुभव में आते हैं; उनका प्रकाश आत्मचैतन्य में होता है। ‘प्रत्यगात्मा’ का आशय शरीर के भीतर स्थित किसी सूक्ष्म व्यक्ति से नहीं, अपने असंग चैतन्यस्वरूप से है। आत्मा ज्ञेय पदार्थों की पंक्ति में रखी जाने वाली वस्तु नहीं है। शास्त्र उसी के विषय में आरोपित सीमितता का निराकरण करता है। इसलिए ‘अयमात्मा ब्रह्म’ अहंकार की सर्वशक्तिमत्ता की घोषणा नहीं है। विद्वत्ता, दुर्बलता, सफलता और असफलता व्यक्तित्व के धर्म हैं; शुद्ध आत्मा इनसे परिच्छिन्न नहीं होता। अज्ञान में देह और मन की सीमाएँ आत्मस्वरूप पर आरोपित होती हैं। ज्ञान इस तादात्म्य का विवेक करता है। सीमित बुद्धि सर्वज्ञ नहीं बनती; बुद्धि की सीमा को आत्मा की सीमा मानने वाला भ्रम निवृत्त होता है। ब्रह्मात्मैक्य में दो पृथक् सत्ताओं का मिलन नहीं, उनकी कल्पित पृथकता का निरसन है। ‘सोऽयमात्मा चतुष्पात्’ इसी अखण्ड सत्य के विवेचन की पद्धति प्रस्तुत करता है। आत्मा के चार पाद उसके चार पृथक् अवयव नहीं हैं। जाग्रत् में वैश्वानर, स्वप्न में तैजस और सुषुप्ति में प्राज्ञ के रूप में उसी आत्मा का उपाधिसम्बद्ध निरूपण होता है। उपाधियों से असंस्पृष्ट उसका स्वरूप तुरीय कहलाता है। शाङ्करभाष्य में यह विभाग आत्मबोध का उपाय है। अवस्थाओं और उनकी उपाधियों का क्रमशः विवेक करके साधक उस अविभक्त सत्य को पहचानता है जो सभी अनुभवों का अधिष्ठान है। तुरीय तीन अवस्थाओं के पश्चात् उत्पन्न होने वाला कोई चौथा अनुभव नहीं है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में अनुभव की रचना बदलती है; आत्मस्वरूप का सत्य अक्षुण्ण रहता है। ‘चतुर्थ’ का निर्देश तीनों अवस्थाओं के धर्मों से आत्मा की असंगता समझाता है। इसलिए चार पादों का अध्ययन चार आत्माओं की खोज नहीं है। विभाग की सार्थकता अविभक्त स्वरूप के बोध में है। इस महावाक्य की साधना में ‘मैं’ के वास्तविक अभिप्राय का अनुसन्धान आवश्यक है। श्रवण से आत्मब्रह्मैक्य का तात्पर्य स्पष्ट होता है, मनन संशयों का निराकरण करता है और निदिध्यासन देहात्मबुद्धि के विपरीत आग्रहों को शिथिल करता है। संयम, कर्तव्यनिष्ठा और अन्तःकरण की निर्मलता इस बोध के अनुकूल हैं। आत्मज्ञान कोई नवीन पूर्णता उत्पन्न नहीं करता; वह अपनी पूर्णता को भविष्य की उपलब्धियों पर निर्भर मानने की भ्रान्ति मिटाता है। आत्मैक्य की दृष्टि जीवन में विनय, करुणा और समत्व को पुष्ट करती है। विश्व का परम आधार ही अपना नित्यसिद्ध आत्मस्वरूप है; इस अपरोक्ष बोध में परतन्त्रता का अज्ञान निवृत्त होता है और स्वभावसिद्ध शान्ति प्रकाशित होती है। #माण्डूक्योपनिषद् #भगवद्पादाचार्य #अद्वैत_वेदान्त #Adi_Shankracharya #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at New Delhi, India
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Normally wouldn't post an interview transcript of this length, but if you're interested in keeping tabs on Cabinet support for Shabana Mahmood's immigration reforms, this is worth a read from Energy Secretary Miatta Fahnbulleh Sophy Ridge: Just to be crystal clear: Do you support plans for people to have lived in the UK for 15 years before they can get permanent residency? Miatta Fahnbulleh: The first thing I'd say, because there's been a lot of speculation, Shabana has got a really tough job and I think a home secretary getting a grip on small boats crossings is something that all of us want to see. SR: Can I just come in? I really just want a straight answer. Do you support plans for people to live in the UK for 15 years before they get permanent residency? MF: Look, we have got to reform our immigration system and my view is that we need a system that is based on the principle of compassion, contribution. And so there is a package of reforms the Home Secretary has been consulting on, she's looking at the range of responses and she will come out with the measures that we take forward. But the key thing I would say is no one can look at our immigration system, and I say this as someone that came into this country as a refugee, and not believe that it's broken and not believe that we need to fundamentally reform it. But our principle has to be a system where we've got control, but ultimately a system that when people do come to this country, they are able to integrate, they are able to contribute, and that we both respect but also value that contribution. SR: Okay. You haven't, in any part of that answer, said that you agree with these reforms. I'm just going to read you the definition of collective responsibility: "Decisions made by the cabinet are binding on all members of the government. This means if a minister disagrees with the government policy, he or she must still publicly support it". So I'm going to ask you a third time, do you support plans for people to have to live in the UK for 15 years before they can get permanent residency? MF: I support reforms that say that people have to contribute and make a contribution to this country, in order to get citizenship. We are consulting on the package of reforms that we'll put forward and the Home Secretary, as you can imagine, having looked at all the responses, will set out what the final position is. SR: Do you support the plans or not? It's my fourth time asking. MF: So I absolutely support the plans to reform our immigration system. It is broken SR: I'm asking you something super specific here. Do you support plans for people to live in the UK for 15 years before you get permanent residency? MF: The Home Secretary is consulting on those plans, and she will set up the government's final position. SR: You can't say whether you support that or not? MF: The Home Secretary is consulting. Look, we absolutely need to reform our immigration system. I support the reforms. And by the way, it is not easy to reform our immigration system. So I 100% back Shabana Mahmood and everything she is trying to do, but there is a package of reforms. We are consulting in the way that government always does. And the Home Secretary, rightly having looked at all the responses to the consultation, will set out the final package that ultimately will do the job of reforming our immigration system based on the principle of control, which we absolutely must do. But critically, a system that ensures that people make a contribution and when they make a contribution, they are integrated into our communities so that we can have diverse communities, like my one in Peckham, in which people can live together and can ensure that they are making the contribution to get to the country and the society that we want. SR: I know you've got to go, but I think from what you've said, it's pretty clear that you don't support waiting 15 years for permanent residency. So I'm just going to give you one chance to correct that if that's not your view MF: Don't put words in my mouth. The key point is we are consulting... SR: I'm not. I'm saying, this is your chance to correct that if that is not your view, because this is the impression you've given. So if you don't think that, tell us now. MF: We are consulting on the package of proposals that were put forward. The Home Secretary is looking at the consultation and she will set out our final position. But what I absolutely back Shabana on is the need to reform our immigration system, because it is fundamentally broken. And I also fundamentally support the principles that we have got to control our borders, because everyone expects us to do that, and critically, that we have to have a system in which people contribute and when they contribute, they are able to become citizens and they are able to be integrated into our community. That is an immigration system that makes sense. That is an immigration system that will build public concern. And she's absolutely right to try and deliver that immigration system.
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What all is wrong in this video:- - Dangerously incorrect handling of a loaded weapon - All aspects of safety of weapon handling violated - Pointing a loaded weapon in all directions. Ppl in background are visibly terrified - Firing a service weapon for an unauthorised act in a non authorised dress - Basic weapon handling drill taught in the trg academies not adhered to - Such irresponsible action can cause death or hurt to self or others - Overall a black demo of authority w/o responsibility - Such acts of indiscipline must be appropriately punished to avoid reoccurrence
Ankita Sharma, an IPS officer currently posted as Superintendent of Police (SP) of Rajnandgaon in Chhattisgarh, was seen firing an AK-47 during the Vijayadashami celebrations. Such an act is reckless and reflects a complete disregard for the safety of people in the vicinity.
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।। माण्डूक्योपनिषद् ।। ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव। यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ।।१।। माण्डूक्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र नामरूपमय विश्व के मध्य अखण्ड ब्रह्मसत्ता का उद्घोष है। जो भूत, वर्तमान और भविष्य है तथा जो इन कालविभागों से परे है, सब ओंकार में समाविष्ट है। इस सर्वात्मकता का प्रयोजन साधक की दृष्टि को परिवर्तनशील प्रपञ्च से उसके अविकारी अधिष्ठान की ओर उन्मुख करना है। प्रणव समस्त ब्रह्मविद्या का आलम्बन बनकर आत्मा की नित्यसिद्ध पूर्णता प्रकाशित करता है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य इस उद्घोष का मर्म अभिधान और अभिधेय की अनन्यता से स्पष्ट करते हैं। अभिधान नाम है और अभिधेय उससे प्रतिपादित अर्थ। समस्त पदार्थप्रपञ्च अपने नामों से तथा नामों का विस्तार ओंकार से अनन्य है। परब्रह्म का बोध भी आरम्भ में इसी वाच्य और वाचक के सम्बन्ध द्वारा कराया जाता है। नाम, रूप और उनके व्यवहार की स्वतन्त्र पारमार्थिक सत्ता नहीं है; सबका अधिष्ठान एक अद्वितीय ब्रह्म है। ओंकार इसी समग्रता का बोधक है। ‘अक्षर’ यहाँ उच्चारणयोग्य प्रणव का निर्देश करता है। उसकी श्रव्य ध्वनि का आरम्भ और अन्त होता है, जबकि उसका प्रतिपाद्य ब्रह्म उत्पत्ति और विनाश से रहित है। अतः ओंकार के अर्थचिन्तन में ध्वनि से उसके द्वारा बोधित आत्मतत्त्व की ओर बढ़ना आवश्यक है। ‘इदं सर्वम्’ में बाह्य पदार्थों के साथ शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार भी समाहित हैं। अनुभव के ये समस्त विषय उसी सत्ता पर आश्रित हैं, जिसके प्रकाश में उनका ज्ञान होता है। स्वर्ण के हार, कंगन और कुण्डल नाम तथा आकृति में भिन्न होकर भी स्वर्ण से पृथक् द्रव्यसत्ता नहीं रखते। इसी प्रकार जगत् अपने ब्रह्माधिष्ठान से अनन्य है। दृष्टान्त का आशय अनन्यता समझाना है; ब्रह्म निर्विकार रहता है। जगत् का मिथ्यात्व उसकी ब्रह्मनिरपेक्ष, स्वतन्त्र सत्ता का अभाव है। व्यवहार में कर्म, फल और कर्तव्य का स्थान बना रहता है। विवेक परिवर्तनशील उपलब्धियों में आरोपित निरपेक्ष सत्यत्व को निवृत्त करता है और साधक को अपने नित्य पूर्ण स्वरूप की ओर लौटाता है। ‘तस्योपव्याख्यानम्’ ओंकार के इसी रहस्य के स्पष्ट प्रतिपादन का संकेत है। भाष्य में प्रणव पर और अपर ब्रह्म के बोध का आलम्बन है। ‘भूतं भवद्भविष्यत्’ समस्त कालबद्ध अस्तित्व को समेटता है। शरीर की अवस्थाएँ, मन की वृत्तियाँ और जीवन की परिस्थितियाँ बदलती हैं; उनका प्रकाशक चैतन्य इन परिवर्तनों से असंग है। आत्मा का नित्यत्व किसी अत्यन्त दीर्घ अवधि में बने रहना नहीं, कालपरिच्छेद से रहित होना है। ‘यच्चान्यत्त्रिकालातीतम्’ की व्याख्या में भाष्यकार अव्याकृत आदि का भी ग्रहण करते हैं, जो अपने कार्यों से जाना जाता है। इसलिए इस पद में व्यक्त जगत् के अव्यक्त कारण का समावेश भी समझना चाहिए। अव्याकृत कारण और कारणातीत ब्रह्म का विवेक आवश्यक है। अद्वैतबोध में कार्य और कारण, दोनों की स्वतन्त्र पारमार्थिक सत्ता निवृत्त होती है। मन्त्र में पुनरुक्त ‘एव’ इसी सर्वसमावेशकता को दृढ़ करता है। अखण्डता अनेक वस्तुओं का संग्रह नहीं, द्वितीय स्वतन्त्र सत्य का अभाव है। आत्मज्ञान का प्रयोजन किसी नवीन आत्मा की उत्पत्ति नहीं है। अज्ञानवश मनुष्य देह की सीमाओं और मन के विकारों को अपना स्वरूप मान लेता है। जैसे - रज्जु का ज्ञान सर्पभ्रम को निवृत्त करता है, वैसे ही आत्मबोध इस आरोपित सीमितता का निरसन करता है। प्रथम मन्त्र की ओंकारदृष्टि अगले मन्त्र के ‘अयमात्मा ब्रह्म’ में अपनी अन्तरंग पूर्णता प्राप्त करती है। जगत् का अधिष्ठान ही अपना प्रत्यगात्मस्वरूप है। इस बोध में अहंकार की महत्ता नहीं बढ़ती; देहाभिमान का मूल भ्रम शिथिल होता है। प्रणवजप चित्त की एकाग्रता में सहायक है और अर्थचिन्तन आत्मविवेक को पुष्ट करता है। आचार्योपदेशपूर्वक श्रवण, मनन और निदिध्यासन साधक को स्वरूपनिष्ठा की ओर ले जाते हैं। ध्वनि और उसके उपरान्त का मौन, दोनों ज्ञात होते हैं; आत्मतत्त्व उनका असंग प्रकाशक है। साधना की पूर्णता इसी आत्मबोध में है। यह दृष्टि व्यवहार में सत्य, संयम, करुणा और निष्काम कर्म को प्रकाशित करती है। ओंकार का आश्रय लेकर साधक समस्त नामरूपों के अधिष्ठान को अपने नित्यसिद्ध आत्मस्वरूप में पहचानता है; उसी बोध में स्वभावसिद्ध शान्ति प्रकट होती है। #माण्डूक्योपनिषद् #भगवद्पादाचार्य #अद्वैत_वेदान्त #Adi_Shankracharya #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at Haridwar, India
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एक-दो दिन पहले एक वीडियो देखा, जिसमें कोई मंत्री जी मंच पर दलेर मेहंदी जी से जिस तरह बात कर रहे थे, उसे देखकर बहुत दुख हुआ। मैं दलेर जी को बहुत सालों से जानता हूँ। यह भी जानता हूँ कि पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत ठीक नहीं रही है। मंत्री जी, आपको उनकी प्रस्तुति से शिकायत हो सकती है। नाराज़गी भी हो सकती है। लेकिन सबके सामने मंच पर जाकर इस तरह उन्हें अपमानित करना ज़रूरी था क्या? यही बात उनसे अलग बैठकर, इज़्ज़त से भी तो कही जा सकती थी। एक कलाकार अपनी मेहनत से जो पहचान और सम्मान कमाता है, उसके पीछे पूरी ज़िंदगी लगी होती है। दलेर जी ने पिछले तीस-पैंतीस सालों से अपने गानों से हम सबको ख़ुशी दी है। उस योगदान की कुछ तो क़द्र होनी चाहिए। दलेर जी, मैंने आपको हमेशा एक नेकदिल, प्यार बाँटने वाले इंसान के रूप में जाना है। जहाँ तक मैं आपको जानता हूँ, आप शराब भी नहीं पीते। आपको यह सब सहना पड़ा, इसका मुझे बहुत अफ़सोस है। अपनी इंडस्ट्री के साथियों से भी कहना चाहूँगा—जो लोग दलेर जी को जानते हैं, वे अपनी बात ज़रूर रखें। उनके साथ खड़े हों। किसी के अच्छे स्वभाव के बारे में, उसकी इंसानियत के बारे में अपने अनुभव से दो शब्द कहना भी बहुत मायने रखता है। ऐसे वक़्त में एक साथी के लिए इतना तो हम कर ही सकते हैं। दलेर जी, आप बेहतरीन कलाकार हैं और उतने ही प्यारे इंसान भी। अपना ख़याल रखिए। भगवान आपको अच्छी सेहत दे। मेरा प्यार और सम्मान हमेशा आपके साथ है। 🙏❤️
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