गंभीरता से पढ़े !!!!
कल बीजेपी के एक बेहद प्रभावशाली नेता के यहाँ जाना हुआ।एक नेता के साथ राजनीति को कवर करने वाले पत्रकार की मुलाक़ात होगी तो निश्चित रूप से राजनीति पर ही चर्चा होगी।हुआ भी वही।
बीजेपी पर,मोदी सरकार पर,मोदी सरकार में होने वाले विस्तार को लेकर,राहुल गांधी की राजनीति पर, एसआईआर पर,मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के भविष्य पर,देश के राजनीतिक परिदृश्य पर,यूपी चुनाव पर,संघ पर विचारों का आदान प्रदान हुआ।लेकिन सबसे लंबी चर्चा यूजीसी को लेकर हुई।यूजीसी पर सरकार के रूख को लेकर मैंने निराशा और नाराजगी व्यक्त की।मैंने नेता जी से पूछा कि बीजेपी ने इतना आत्मघाती कदम क्यो उठाया? केंद्र सरकार ने अभी तक ऐतिहासिक भूल सुधार क्यो नहीं की?
बीजेपी के वरिष्ठ नेता का जवाब चौकाने वाला था। नेता ने कहा कि “सरकार मन से मान रही है कि यूजीसी के मामले को लेकर गलती हुई है,सरकार भूल सुधार चाहती है लेकिन बीजेपी के एससी,एसटी और ओबीसी नेताओं के साथ सहयोगी दलों के नेताओं का भारी दबाव है,जिसके कारण केंद्र सरकार कदम पीछे खींचने का साहस नहीं जुटा पा रही है।बीजेपी के सहयोगी दलों में नेता ने ओम प्रकाश राजभर,संजय निषाद,अनुप्रिया पटेल के साथ अन्य नेताओं का जिक्र किया।
मैं हैरान और हतप्रभ था।मैंने नेता जी से कहा कि क्या अब राजभर,निषाद या अनुप्रिया पटेल या अन्य ओबीसी नेताओं का आप नाम ले रहे हो यह लोग अब सवर्णों के भविष्य का फैसला करेंगे? क्या सवर्ण समाज अब इन पिछड़ों की राजनीति करने वाले छोटे दलों के रहमो करम पर निर्भर है?
नेता ने कहा कि “यूपी चुनाव को देखते हुए ओबीसी वोट की चिंता बीजेपी कर रही हैं।मैंने पूछा कि “क्या बीजेपी के लिए ओबीसी वोट बैंक ही सबकुछ है।सवर्ण समाज की जरा भी चिंता नहीं है? नेता ने गोल मोल जवाब दिया।सीधा कहने से बच रहे थे।अपनी पार्टी को बचा रहे थे।
दरअसल पूरी बातचीत से मुझे समझ आया कि बीजेपी दो नावों पर पैर रख रही है।दोनों को साधने की कोशिश कर रही है।सवर्ण भी सधे और ओबीसी भी झोली में गिरे।बीजेपी की पहली प्राथमिकता एससी,एसटी और ओबीसी है,दूसरी प्राथमिकता सवर्ण है।मतलब एससी,एसटी और ओबीसी हर हाल में साधना है,भले ही सवर्ण हाथ से फिसल जाए।
क्या सवर्ण समाज शरणार्थी है? सवर्ण समाज को समझना होगा कि सत्ता ज़रूरी है कि समाज? सत्ता तो आती जाती रहेगी,समाज रहना चाहिए।जब समाज का मान सम्मान सब चला जाएगा तो ऐसी सत्ता लेकर क्या करेंगे? सवर्ण समाज की आने वाली पीढ़ी पूछेगी कि जब सवर्ण समाज को मुखर होकर विरोध दर्ज कराना था,तब समाज के लोगों ने चुनी हुई चुप्पी क्यों चुन ली? सवर्ण समाज सत्ता दिला सकता है तो सत्ता से बेदखल कर भी सकता है।सवर्ण समाज के धैर्य ने बीजेपी को सत्ता की धरोहर दी है।सवर्ण समाज धैर्य को धरकर बैठा है।धैर्य की परीक्षा ना ले।
माननीय मुख्यमंत्री श्री मोहन यादव जी, आपके लिए कुछ कड़े और स्पष्ट सुझाव हैं।
पहला यह कि 'जिंदाबाद' और 'मुर्दाबाद' के नारे लगाने से दूर रहना चाहिए, क्योंकि नारे लगाने का काम गुर्गों का होता है, राजा का नहीं।
दूसरा यह कि अपने पर्सनल स्टाफ को थोड़ा प्रोफेशनल रखना चाहिए। कल की घटना में पीएसओ (PSO) का रिएक्शन पूरे सोशल मीडिया में सर्वव्यापी है, जिससे सरकार की फजीहत हो रही है।
तीसरा यह कि स्टाफ का शिष्टाचार और उनके कार्य-कलाप ठीक होने चाहिए। प्रायः यह देखने में आता है कि मुख्यमंत्री के साथ बिना किसी काम-धाम के केवल झांकीबाजी के लिए 10-15 पर्सनल स्टाफ नाश्ते से लेकर भोजन की जुगाड़ में घूमता रहता है। इसके अलावा, सब अपने मूल कार्य को छोड़कर अन्य कार्यों में संलग्न रहते हैं, जैसे पुलिस सुरक्षा छोड़कर सोशल मीडिया मैनेजर बनना आदि-आदि।
साफ बात यह है कि एक अच्छी टीम ही आगे बढ़ाती है और उसमें योग्य लोग होने चाहिए, अन्यथा बंटाधार तय है।
मध्यप्रदेश में जाँच समितियाँ और जहरीली शराब, दोनों समांतर चलती हैं- एक का काम मौत बाँटना है और दूसरे का काम मौतों की गिनती भूलना !!
कुछ पूर्व की घटनाएँ देखें आप मध्यप्रदेश में जहरीली शराब से हुई मौतों का सिलसिला
1. वर्ष 2020 (रतलाम, नामली): 6 मौतें
2. अक्टूबर 2020 (उज्जैन):12 मौतें
3.जनवरी 2021 (मुरैना, छैरा एवं आसपास):24-25 मौतें
4.जुलाई 2021 (मंदसौर, पिपलियामंडी):कई मौतें
5.वर्ष 2022 (भिंड, इंदुरखी):4 मौतें
6.सितंबर 2026 (सागर, बंडा एवं शाहगढ़):20 मौतें
7. ताजा मामला (देवास, चंदाना, बिंजाना एवं आसपास): 13 मौतें
समानो मन्त्रः समितिः समानी
संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक इंदौर में आज से शुरू होने जा रही है
बैठक का एक महत्वपूर्ण विषय संगठन की नई रचना भी है। इस संबंध में पहले विचार हो चुका है। अब बैठक में इसकी अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। अगले साल मार्च में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा से पहले संगठन का नया ढांचा तैयार कर लिया जाएगा। इसके अनुरूप जिला, विभाग, प्रांत, क्षेत्र और अखिल भारतीय स्तर पर चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
नए स्वरूप के अनुसार प्रचारकों एवं पदाधिकारियों के चुनाव की प्रक्रिया जितनी सामान्य दिखती है उतनी होगी नहीं खासकर मध्यप्रदेश जैसे मातृ संगठन प्रदेश में हर प्रचारक अपनी गोटी बैठाने में लग गया है सबसे अधिक माथापच्ची प्रदेश प्रचारक को लेकर है सामान्यता पद प्रदान करने में संघ आयु एवं वरिष्ठता को प्राथमिकता प्रदान की जाती रही है क्या यह आगे की रचना में भी रहेगा ?
संघ की कार्यप्रणाली में वरिष्ठता और अनुभव का सम्मान हमेशा से प्राथमिक रहा है, विशेषकर प्रांत प्रचारक जैसे पदों पर निर्णय लेते समय यह देखा जाता है कि प्रचारक ने संगठन में कितना समय दिया है। हालांकि, वर्तमान में संघ अपने शताब्दी वर्ष के पड़ाव पर है और कार्य का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए केवल वरिष्ठता ही एकमात्र मानदंड नहीं रह गया है, बल्कि ऊर्जावान और आधुनिक चुनौतियों के अनुकूल नेतृत्व को भी आगे लाने का प्रयास किया जा रहा है।
वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश संघ की आंतरिक व्यवस्था में शक्ति के तीन प्रमुख केंद्र उभरकर सामने आते हैं। राज्य में संघ का प्रभाव और नियंत्रण मुख्य रूप से भैया जी जोशी, सुरेश सोनी और दीपक विस्पुटे के इर्द-गिर्द केंद्रित माना जाता है। इन तीनों शीर्ष अधिकारियों की अपनी कार्यशैली,निष्ठावान कार्यकर्ताओं का समूह और सांगठनिक पकड़ है, जिसके कारण मध्य प्रदेश में प्रांत प्रचारक से लेकर अन्य महत्वपूर्ण दायित्वों के निर्धारण में इनकी सहमति और प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में नई रचना के तहत जब नए स्वरूप और दायित्वों की घोषणा की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, तो वरिष्ठता के सिद्धांतों के साथ-साथ इन तीनों पावर सेंटरों के बीच का संतुलन और प्रचारकों की व्यक्तिगत सक्रियता ही नए ढांचे का अंतिम रूप तय करेगी।
जय श्री राम !!
@RSSorg
देवास जिले के नेमावर रोड में वाहनों की चेकिंग के दौरान एक संदिग्ध वाहन ने थाना प्रभारी दिलीप पूरी को अपनी चपेट में ले लिया । जिससे उनकी दुखद मृत्यु हो गई ।
बताया जा रहा है कि वाहन में शराब की पेटियाँ भरी हुई थी। क़ानून के रक्षक शराब माफियाओं के आगे बेबस हैं क्या ?
संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक इंदौर में आज से शुरू होने जा रही है
बैठक का एक महत्वपूर्ण विषय संगठन की नई रचना भी है। इस संबंध में पहले विचार हो चुका है। अब बैठक में इसकी अंतिम रूपरेखा तय की जाएगी। अगले साल मार्च में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा से पहले संगठन का नया ढांचा तैयार कर लिया जाएगा। इसके अनुरूप जिला, विभाग, प्रांत, क्षेत्र और अखिल भारतीय स्तर पर चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
नए स्वरूप के अनुसार प्रचारकों एवं पदाधिकारियों के चुनाव की प्रक्रिया जितनी सामान्य दिखती है उतनी होगी नहीं खासकर मध्यप्रदेश जैसे मातृ संगठन प्रदेश में हर प्रचारक अपनी गोटी बैठाने में लग गया है सबसे अधिक माथापच्ची प्रदेश प्रचारक को लेकर है सामान्यता पद प्रदान करने में संघ आयु एवं वरिष्ठता को प्राथमिकता प्रदान की जाती रही है क्या यह आगे की रचना में भी रहेगा ?
संघ की कार्यप्रणाली में वरिष्ठता और अनुभव का सम्मान हमेशा से प्राथमिक रहा है, विशेषकर प्रांत प्रचारक जैसे पदों पर निर्णय लेते समय यह देखा जाता है कि प्रचारक ने संगठन में कितना समय दिया है। हालांकि, वर्तमान में संघ अपने शताब्दी वर्ष के पड़ाव पर है और कार्य का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए केवल वरिष्ठता ही एकमात्र मानदंड नहीं रह गया है, बल्कि ऊर्जावान और आधुनिक चुनौतियों के अनुकूल नेतृत्व को भी आगे लाने का प्रयास किया जा रहा है।
वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश संघ की आंतरिक व्यवस्था में शक्ति के तीन प्रमुख केंद्र उभरकर सामने आते हैं। राज्य में संघ का प्रभाव और नियंत्रण मुख्य रूप से भैया जी जोशी, सुरेश सोनी और दीपक विस्पुटे के इर्द-गिर्द केंद्रित माना जाता है। इन तीनों शीर्ष अधिकारियों की अपनी कार्यशैली,निष्ठावान कार्यकर्ताओं का समूह और सांगठनिक पकड़ है, जिसके कारण मध्य प्रदेश में प्रांत प्रचारक से लेकर अन्य महत्वपूर्ण दायित्वों के निर्धारण में इनकी सहमति और प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में नई रचना के तहत जब नए स्वरूप और दायित्वों की घोषणा की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, तो वरिष्ठता के सिद्धांतों के साथ-साथ इन तीनों पावर सेंटरों के बीच का संतुलन और प्रचारकों की व्यक्तिगत सक्रियता ही नए ढांचे का अंतिम रूप तय करेगी।
जय श्री राम !!
@RSSorg
अशोकनगर कलेक्टर साकेत मालवीय का रौद्र रूप, कृषि उपज मण्डी में आने वाले वाहनो एवं नीलामी के संबंध में उचित जानकारी नहीं मिलने के कारण अधिकारियों को फटकार लगाते हुए ।
नाम प्रहलाद पांडेय था
जाति- ब्राह्मण थी
घंटा मंत्री द्वारा ‘साला’ जैसे शब्द से पुकारा गया, कोई जातिवादी ने सवाल नहीं उठाया !!!
@VoiceOfBrahmins @ajeetbharti @Shubhamshuklamp
मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (ESB) का प्रशासनिक कौशल और दूरदर्शिता देखिए—'सीधी भर्ती' के विज्ञापन पर काम करते-करते इन्होंने परीक्षा का सेंटर भी 'सीधी' ही तय कर दिया।
युवाओं को सीधी भेजने के पीछे मंडल का स्पष्ट उद्देश्य परीक्षार्थी के केवल विषयगत ज्ञान को परखना नहीं, बल्कि उसकी शारीरिक सहनशीलता, धैर्य और परिवहन व्यवस्था से जूझने की क्षमता का संपूर्ण मूल्यांकन करना है।
साथ ही इसके पीछे सीधी जिले की जीडीपी (GDP) को रातों-रात रॉकेट बनाने का एक गुप्त और भगीरथ प्रयास छिपा हुआ है , लगता है राज्य के अर्थशास्त्रियों ने सीधी की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने का सारा ठेका अकेले ESB को ही सौंप दिया है।
इस लिहाज़ से देखें तो ESB केवल परीक्षा कराने वाली संस्था नहीं रही, बल्कि वह एक 'इकोनॉमिक बूस्टर एजेंसी' बन चुकी है
दुर्गम यात्रा करके सीधी पहुँचने वाला परीक्षार्थी अगर पर्चे में शून्य भी ले आए, तो भी उसे दुखी नहीं होना चाहिए—क्योंकि उसका यह त्याग सीधी जिले के आर्थिक विकास में एक ऐतिहासिक और अमर योगदान के रूप में याद रखा जाएगा |
सारांश- लौंदू ESB वालो जो बच्चों ने प्रेफ्रेंस भरी है उसके हिसाब से सेंटर दो। कि सीधी को अपना माईबाप बना लिया है कितने बच्चे परेशान हो रहे हैं वैसे ही बेरोज़गारी है और तुम आर्थिक बोझ लाद दो
@ElectionMP2028 @PEB_Bhopal @sanjaygupta1304 @rupeshmishramp @sabkikhabar @PrabhuPateria @P0LITICAL_ADDA @Rishita124 @drbrajeshrajput
उत्तरप्रदेश में चुनावी बिगुल बज चुका है, भाजपा की कार्यसमिति बैठक में सम्मिलित होने के लिए लखनऊ पहुँचे हैं गृहमंत्री अमित शाह ।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की माता जी श्रीमती काशी बाई जी का आज प्रातः उपचार के दौरान भोपाल एम्स में दुःखद निधन हो गया है
ओम शांति !!!!
@ChouhanShivraj
युवा वर्ष के रुझान आने शुरू हो गए हैं —
MP में SC युवाओं को रोजगार देने की सरकारी योजना में प्लेसमेंट घोटाला
ट्रेनिंग के बाद नौकरी मिलने के दावों पर सवाल, हितग्राहियों ने रोजगार मिलने से किया इनकार
जिन कंपनियों के नाम पर जारी हुए नियुक्ति पत्र, उन्होंने दस्तावेजों को नकारा
MAPCET के तहत SC युवाओं को ट्रेनिंग देकर रोजगार दिलाने की थी जिम्मेदारी
70% प्रशिक्षुओं को रोजगार दिलाने की शर्त पर 34 एजेंसियों का हुआ था चयन
कौशल विकास योजना में ₹32.41 करोड़ का जिक्र, दो साल में MAPCET को ₹29.45 करोड़ आवंटित
फर्जी प्लेसमेंट देने में सी CRISP और AISECT जैसी कंपनियों के नाम
योजना के क्रियान्वयन में कथित अनियमितताओं को लेकर शिकायत भी की गई
#MadhyaPradesh #MPNews
मध्यप्रदेश में नवनियुक्त डीजीपी (DGP) को लेकर चल रही उठापटक किसी से छिपी नहीं है। हाल ही में पुलिस मुख्यालय (PHQ) और गृह विभाग के बीच वर्तमान डीजीपी कैलाश मकवाना की सेवानिवृत्ति की तारीख को लेकर भी खींचतान देखने को मिली, जिस पर बीते दिन विराम लग गया।
प्रायः भाजपा सरकारों में यह परिपाटी देखी गई है कि केंद्र, राज्यों में अपना प्रशासनिक नियंत्रण और तालमेल बनाए रखने के लिए मुख्य सचिव (CS) तथा डीजीपी स्तर के शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति स्वयं तय करता है। मध्यप्रदेश के मामले में भी यही स्थिति बनती दिख रही है।
पूर्व मुख्य सचिव अनुराग जैन और अशोक वर्णवाल की नियुक्तियों में भी स्पष्ट रूप से केंद्र की मंशा ही सर्वोपरि रही, जहाँ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अधिक नहीं चल सकी। जहाँ तक कैलाश मकवाना का प्रश्न है, उनकी व्यक्तिगत छवि ने उन्हें डीजीपी पद तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, क्योंकि केंद्र सरकार सूक्ष्म स्तर पर फीडबैक लेकर निर्णय करती है।
ऐसे में यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश का अगला डीजीपी भी केंद्र के स्तर से ही तय होगा।
Mr.Binod retweeted
खड़गे के बयान के बाद तुरंत ही सांसदों के व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज आया कि भाइयों-बहनों, जो जहाँ हैं वो या तो मीडिया बाइट दे दो, या ख़ुद ही वीडियो बना कर पोस्ट करो कि मन व्यथित है।
लग गए सब। मन व्यथित है के वीडियो बनने लगे हैं मोदी जी के लिए विक्टिमहुड जुटाने में। इनको कभी देखा है आपने कि इन्होंने हिंदुओं के देवी देवताओं को जो कबूतर गालियाँ देते हैं, लिखते हैं, कभी एक शब्द बोलते हुए?
आप ब्रह्मा जी को कुछ कह दो, कोई दोगला कुछ नहीं बोलेगा, महादेव को कह दो, राम जी को कह दो, सीता माता को, दुर्गा जी को कह दो, सब स्वीकार्य है, पर मोदी जी अक्षुण्ण रहने चाहिए।
ब्रांड मोदी, जो बहुरूपिया तत्व में घुल चुका है, उसको उबारने के लिए तुरंत सब, गंभीर सा मुँह बनाए कि स्वस्थ लोकतंत्र में स्कोडा लहसुन होता है, कांग्रेस का चाल- चरित्र और स्कोडा-लहसुन दिख रहा है, उनकी ख़ुद की आयु इतनी है, मर्यादा झाल-झिंगुर!











