
कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः अल्हड़! असभ्य! सांप्रदायिक! @vanmaali पौराणिक भारतीय
भारत
Joined December 2019
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वृषाकपि retweeted
तमोगुण का ब्रांड एम्बेसडर हूँ मैं!
वृषाकपि retweeted
स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते।
चलचित्रों अथवा दूरदर्शन धारावाहिकों से यदि आप अपने धर्म और इतिहास आदि की कथाओं को जानना चाहते हैं अथवा उन पात्रों को निभाने वाले व्यक्तियों में आप अपने भगवान खोज रहे हैं, तो यह आपकी कमी मानी जाएगी।
मुझे यह समझ नहीं आता कि जिनका कार्य ही किसी पात्र को परदे पर प्रस्तुत करना है, उनसे आप यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे उस पात्र को अपने जीवन में भी उतारेंगे। ऐसा करने वाला तो अच्छा कलाकार निश्चित ही नहीं होगा।
आपकी जाति का जो नेता बना फिरता है, क्या वह अपनी जाति/वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यों का पालन कर रहा है? क्या ब्राह्मण नेता का जीवन ब्राह्मणों जैसा है? क्षत्रिय नेतृत्वकर्ता का जीवन क्षत्रियों जैसा है? जो "हिंदू हृदय सम्राट" बना बैठा है, क्या वह पूर्ण रूप से हिंदुओं के विधि-निषेध का पालन कर रहा है? तो फिर सारी नैतिकता केवल कलाकारों या खिलाड़ियों के सिर पर ही क्यों थोपी जाती है, जबकि वे इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों से अधिक ईमानदार होते हैं।
अपने निजी जीवन को अलग रखते हुए, किसी पात्र के साथ अपने अभिनय से न्याय कर देना ही अच्छे कलाकार का कार्य है। यदि वह ऐसा कर पा रहा है तो वही उसका धर्म है। उनका तो धर्म ही आजीविका कमाना है और उसके प्रति वे ईमानदार हैं। आप क्या देखते हैं, कहाँ अपना धन व्यय करते हैं, यह आपके विवेक पर निर्भर है। यह सत्य हो सकता है कि कलाकारों का चयन उचित रूप से नहीं किया गया हो, तो यदि आपका हृदय नहीं मानता, तो उस पर अपना धन व्यय न करें।
यदि आप सोच रहे हैं कि कोई मनुष्य राम हो सकता है अथवा कोई स्त्री सीता हो सकती है, तो आप स्वयं अपने धर्म से दूर हैं। स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते, न ही माता सीता कोई दूसरी हो सकती हैं।
यदि आपको भगवान को चलते हुए देखना है, बोलते हुए सुनना है, उनके सौंदर्य को निहारना है, तो किसी आचार्य के पास जाइए और उनसे भगवान की कथा सुनिए। मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि जिस भाव और प्रेम रस में डूबकर आचार्य भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हैं, वे लीलाएँ आपको अपने समक्ष घटित होती प्रतीत होंगी। माखन खाते कन्हैया हों अथवा विराट रूप धारण किए हुए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान के पीछे निवाला लेकर दौड़ती माता कौशल्या हों अथवा माता शबरी की प्रतीक्षारत कुटिया - सब कुछ आपके सामने स्वयं ही प्रकट हो जाएगा।
नोट - जिस चलचित्र पर इतनी चर्चा हो रही है, उसे देखने की कोई इच्छा नहीं है। अभी तक जो भी धार्मिक इतिहास की कथाओं पर आधारित चलचित्रें आई हैं, उनमें से अधिकांश नहीं देखी हैं। जो देखी हैं, उन्हें केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखा है, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं।
वृषाकपि retweeted
पारंपरिक आचार्यों के आश्रित हो उनसे श्री राम कथा सुन कर अपनी आँखो से उन्हें घटित होते हुए अनुभव करने का एक और कारण आप लोगों के समक्ष किसी चलचित्र के ट्रेलर के माध्यम से उपस्थित है😁
स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते।
चलचित्रों अथवा दूरदर्शन धारावाहिकों से यदि आप अपने धर्म और इतिहास आदि की कथाओं को जानना चाहते हैं अथवा उन पात्रों को निभाने वाले व्यक्तियों में आप अपने भगवान खोज रहे हैं, तो यह आपकी कमी मानी जाएगी।
मुझे यह समझ नहीं आता कि जिनका कार्य ही किसी पात्र को परदे पर प्रस्तुत करना है, उनसे आप यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे उस पात्र को अपने जीवन में भी उतारेंगे। ऐसा करने वाला तो अच्छा कलाकार निश्चित ही नहीं होगा।
आपकी जाति का जो नेता बना फिरता है, क्या वह अपनी जाति/वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यों का पालन कर रहा है? क्या ब्राह्मण नेता का जीवन ब्राह्मणों जैसा है? क्षत्रिय नेतृत्वकर्ता का जीवन क्षत्रियों जैसा है? जो "हिंदू हृदय सम्राट" बना बैठा है, क्या वह पूर्ण रूप से हिंदुओं के विधि-निषेध का पालन कर रहा है? तो फिर सारी नैतिकता केवल कलाकारों या खिलाड़ियों के सिर पर ही क्यों थोपी जाती है, जबकि वे इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों से अधिक ईमानदार होते हैं।
अपने निजी जीवन को अलग रखते हुए, किसी पात्र के साथ अपने अभिनय से न्याय कर देना ही अच्छे कलाकार का कार्य है। यदि वह ऐसा कर पा रहा है तो वही उसका धर्म है। उनका तो धर्म ही आजीविका कमाना है और उसके प्रति वे ईमानदार हैं। आप क्या देखते हैं, कहाँ अपना धन व्यय करते हैं, यह आपके विवेक पर निर्भर है। यह सत्य हो सकता है कि कलाकारों का चयन उचित रूप से नहीं किया गया हो, तो यदि आपका हृदय नहीं मानता, तो उस पर अपना धन व्यय न करें।
यदि आप सोच रहे हैं कि कोई मनुष्य राम हो सकता है अथवा कोई स्त्री सीता हो सकती है, तो आप स्वयं अपने धर्म से दूर हैं। स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते, न ही माता सीता कोई दूसरी हो सकती हैं।
यदि आपको भगवान को चलते हुए देखना है, बोलते हुए सुनना है, उनके सौंदर्य को निहारना है, तो किसी आचार्य के पास जाइए और उनसे भगवान की कथा सुनिए। मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि जिस भाव और प्रेम रस में डूबकर आचार्य भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हैं, वे लीलाएँ आपको अपने समक्ष घटित होती प्रतीत होंगी। माखन खाते कन्हैया हों अथवा विराट रूप धारण किए हुए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान के पीछे निवाला लेकर दौड़ती माता कौशल्या हों अथवा माता शबरी की प्रतीक्षारत कुटिया - सब कुछ आपके सामने स्वयं ही प्रकट हो जाएगा।
नोट - जिस चलचित्र पर इतनी चर्चा हो रही है, उसे देखने की कोई इच्छा नहीं है। अभी तक जो भी धार्मिक इतिहास की कथाओं पर आधारित चलचित्रें आई हैं, उनमें से अधिकांश नहीं देखी हैं। जो देखी हैं, उन्हें केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखा है, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं।
वृषाकपि retweeted
हैंस जिमर, ए.आर और कुमार तीनों से अच्छा collaboration तो गाँव की चाची लोग कर लेती हैं...!
शायद महान लोग ऐसा ही ऑस्कर विनिंग क्रियेशन सुनते हैं... यूपी 78 वाले तो शादी, बारातों में ‘सिय रघुवर कोमल कमलनयन...’ ही बजाते आए हैं और आगे भी यही बजता रहेगा...! धर लेओ...अपन...
वृषाकपि retweeted
इससे अच्छा तो The Legend Of Prince Rama के म्यूजिक राइट्स लेकर ही बना देते...जब रीमिक्स और रीक्रिएशन ही करना है...न्यू की नींव तो रामानंद सागर जी ही भर गये थे...जिसको सुनते ही आज भी प्रेमी जनों के कर श्रद्धा से बद्ध हो जाते हैं!
वृषाकपि retweeted
isse mujhe ek school ka funny incident yad aagya...ek ladka classroom me fan on karne utha to use halka current lag gya..meri ek friend chillate hue uthi pani maro pani maro. 2..3 bund maar v di thi bottle se lekr🤣🤣
वृषाकपि retweeted
न कार्तिकसमं धर्म्यमर्थ्यं नो कार्तिकात्परम् ।
न कार्तिकसमं काम्यं मोक्षदानं न कार्तिकात् ॥
"No other month is as auspicious and spiritually meritorious as the month of Kartik. It is also regarded as supremely sacred for its power to bestow moksha"
श्रीमन्नारायण✨
"कृष्णरस-मर्मज्ञ"🤣🤣🤣
आज उठने के बाद से ही मन थोड़ा उदास था पर ये पढ़ कर कुछ मन हल्का हुआ 🙂↕️
युगवक्ता हो गए रामकथा कहने वाले युगकवि डॉ कुमार विश्वास! पहले युगकवि थे, अब युगवक्ता हो गए। विश्वविख्यात तो वह हैं ही। रामकथा से श्रीकृष्णरस मर्मज्ञ हो गए।
इस आदमी को सतेंद्र जैन के साथ तिहाड़ में रखना चाहिए।
राज्यसभा का टिकट नहीं मिला तो यह व्यक्ति रामकथा से श्रीकृष्णरस पर शिफ्ट हो गया! बहुरुपिया। छली। कपटी।
#KumarVishwas
कल एक साथी ने inbox किया था कि एक प्रश्न पूछने पर इसने उन्हें ब्लॉक कर दिया। #Ramayana के ट्रेलर में इन्होंने पटकथा लिखी है कि वनगमन के समय भगवान श्रीराम के आंखों में आंसू थे। नहीं थे। अनपढ़, कुविश्वासी! वह कर्तव्य पथ पर थे और उनको इसका रंचमात्र दुख नहीं था, कि उनके अधिकार से राज्य जा रहा है।
अब यह कुमार विश्वास, श्रीकृष्ण "रस" के मर्मज्ञ हो गए हैं! श्रीकृष्ण रस क्या है? नवरस से आगे की यह कोई संकल्पना है?? नए आचार्य प्रशांत बताएंगे??



































