फॉलो कतई न करें! कुटिल, अग्यानी, कामी, अहंकारी समस्त कलि अवगुणों से सम्पन्न निर्लज्ज हूँ!

पता नहीं कहाँ हूँ!
Joined April 2025
इत्ता पैसा हो सब खरीद लिया जाए...
हमने गरीबी देखी है 🤧। इतना दुःख आज से पहले कभी नहीं हुआ 🤧🤧
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मंगल-मूरति मारुत-नंदन🌺
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जिस पर्व में उपवास रखा जारहा है ,अर्घ्य दिया जारहा ,पवित्र नदियों में स्नान किया जारहा, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाया जारहा, होम किया जारहा वो हिंदू का पर्व नही है! वाह रे दिमाग के पैदल
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इस पर काव्य लिखा जाएगा...
Replying to @narayansuta
वो भी ऐसी ही थी
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Replying to @narayansuta
वो भी ऐसी ही थी
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भाभी हैं या भाभई...
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Replying to @AuthorAtul
रचनात्मकता एक बहाव है। कविता, कहानी, संवाद, गीत, संगीत आदि से यदि बहाव हटा कर, कीवर्ड स्टफिंग करा दिया जाए, ट्रेंड्स को ठूँसा जाए, तो वह एक असेम्बल्ड प्रोडक्ट हो जाता है। ध्वनि होगी, आत्मा नहीं। ‘मंगल रंग’ ऐसा सुनाई पड़ता है मानो वह श्रद्धा का गीत न हो कर, कवि की विद्वता और तत्सम शब्दावली के ज्ञान का गीत हो। बहाव को डेडलाइन से बाँधने पर आधार में गाद ही जमेगी।
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Sun is Hindu god and even offering Namaskar of him considered integral part of Hindu worship and so is chhath puja. and yes it is a local regional festival but the concept of lok devta,gram devta,kuldevta is part of Hinduism so keep ur intresting fact in ur mouth and shut it up .
Interesting fact: Chhath Puja is not a Hindu festival but a local regional festival dedicated to sun god. Unlike Hindu festival, it doesnt involve mantra, or priest. This kind of sun worshipping festival is practised throughout the world.
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Suffered ? I don't know. पर शत्रुघ्न जी की सेवा सबसे कठिन लगती है मुझे।
Who suffered the most in Ramayana?
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Guys मै अगले जनम में डायरेक्टर बनेगी, and यू लोग के लिए रामायण बनाएगी तब तक lets keep saying : मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥
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रैवासा धाम में योग करते हुए एवं बुद्ध गिरी जी की मढ़ी से पूज्य महाराजश्री का मंगलमय सान्निध्य। शेखावाटी, राजस्थान।
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एक मिसरा हूँ मैं, एक मिसरा हो तुम दोनों मिल जाएं तो शे'र हो जाएगा! ~ ताहिर फ़राज़
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तमोगुण का ब्रांड एम्बेसडर हूँ मैं!
यदि करने योग्य कामों में मन न लगे, सोशल मीडिया पर व्यर्थ रील आदि देखते रहें, और नींद अधिक आए, तो समझ लीजिए कि तमोगुण बढ़ रहा है। If you don’t focus on your duties, waste time watching reels etc. on social media, and feel sleepy all the time, then know that tamoguṇa is rising.
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उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने, इस पे क्या लड़ना फलाँ मेरी जगह बैठ गया!
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स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते। चलचित्रों अथवा दूरदर्शन धारावाहिकों से यदि आप अपने धर्म और इतिहास आदि की कथाओं को जानना चाहते हैं अथवा उन पात्रों को निभाने वाले व्यक्तियों में आप अपने भगवान खोज रहे हैं, तो यह आपकी कमी मानी जाएगी। मुझे यह समझ नहीं आता कि जिनका कार्य ही किसी पात्र को परदे पर प्रस्तुत करना है, उनसे आप यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे उस पात्र को अपने जीवन में भी उतारेंगे। ऐसा करने वाला तो अच्छा कलाकार निश्चित ही नहीं होगा। आपकी जाति का जो नेता बना फिरता है, क्या वह अपनी जाति/वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यों का पालन कर रहा है? क्या ब्राह्मण नेता का जीवन ब्राह्मणों जैसा है? क्षत्रिय नेतृत्वकर्ता का जीवन क्षत्रियों जैसा है? जो "हिंदू हृदय सम्राट" बना बैठा है, क्या वह पूर्ण रूप से हिंदुओं के विधि-निषेध का पालन कर रहा है? तो फिर सारी नैतिकता केवल कलाकारों या खिलाड़ियों के सिर पर ही क्यों थोपी जाती है, जबकि वे इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों से अधिक ईमानदार होते हैं। अपने निजी जीवन को अलग रखते हुए, किसी पात्र के साथ अपने अभिनय से न्याय कर देना ही अच्छे कलाकार का कार्य है। यदि वह ऐसा कर पा रहा है तो वही उसका धर्म है। उनका तो धर्म ही आजीविका कमाना है और उसके प्रति वे ईमानदार हैं। आप क्या देखते हैं, कहाँ अपना धन व्यय करते हैं, यह आपके विवेक पर निर्भर है। यह सत्य हो सकता है कि कलाकारों का चयन उचित रूप से नहीं किया गया हो, तो यदि आपका हृदय नहीं मानता, तो उस पर अपना धन व्यय न करें। यदि आप सोच रहे हैं कि कोई मनुष्य राम हो सकता है अथवा कोई स्त्री सीता हो सकती है, तो आप स्वयं अपने धर्म से दूर हैं। स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते, न ही माता सीता कोई दूसरी हो सकती हैं। यदि आपको भगवान को चलते हुए देखना है, बोलते हुए सुनना है, उनके सौंदर्य को निहारना है, तो किसी आचार्य के पास जाइए और उनसे भगवान की कथा सुनिए। मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि जिस भाव और प्रेम रस में डूबकर आचार्य भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हैं, वे लीलाएँ आपको अपने समक्ष घटित होती प्रतीत होंगी। माखन खाते कन्हैया हों अथवा विराट रूप धारण किए हुए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान के पीछे निवाला लेकर दौड़ती माता कौशल्या हों अथवा माता शबरी की प्रतीक्षारत कुटिया - सब कुछ आपके सामने स्वयं ही प्रकट हो जाएगा। नोट - जिस चलचित्र पर इतनी चर्चा हो रही है, उसे देखने की कोई इच्छा नहीं है। अभी तक जो भी धार्मिक इतिहास की कथाओं पर आधारित चलचित्रें आई हैं, उनमें से अधिकांश नहीं देखी हैं। जो देखी हैं, उन्हें केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखा है, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं।
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पारंपरिक आचार्यों के आश्रित हो उनसे श्री राम कथा सुन कर अपनी आँखो से उन्हें घटित होते हुए अनुभव करने का एक और कारण आप लोगों के समक्ष किसी चलचित्र के ट्रेलर के माध्यम से उपस्थित है😁
स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते। चलचित्रों अथवा दूरदर्शन धारावाहिकों से यदि आप अपने धर्म और इतिहास आदि की कथाओं को जानना चाहते हैं अथवा उन पात्रों को निभाने वाले व्यक्तियों में आप अपने भगवान खोज रहे हैं, तो यह आपकी कमी मानी जाएगी। मुझे यह समझ नहीं आता कि जिनका कार्य ही किसी पात्र को परदे पर प्रस्तुत करना है, उनसे आप यह अपेक्षा कैसे कर सकते हैं कि वे उस पात्र को अपने जीवन में भी उतारेंगे। ऐसा करने वाला तो अच्छा कलाकार निश्चित ही नहीं होगा। आपकी जाति का जो नेता बना फिरता है, क्या वह अपनी जाति/वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यों का पालन कर रहा है? क्या ब्राह्मण नेता का जीवन ब्राह्मणों जैसा है? क्षत्रिय नेतृत्वकर्ता का जीवन क्षत्रियों जैसा है? जो "हिंदू हृदय सम्राट" बना बैठा है, क्या वह पूर्ण रूप से हिंदुओं के विधि-निषेध का पालन कर रहा है? तो फिर सारी नैतिकता केवल कलाकारों या खिलाड़ियों के सिर पर ही क्यों थोपी जाती है, जबकि वे इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों से अधिक ईमानदार होते हैं। अपने निजी जीवन को अलग रखते हुए, किसी पात्र के साथ अपने अभिनय से न्याय कर देना ही अच्छे कलाकार का कार्य है। यदि वह ऐसा कर पा रहा है तो वही उसका धर्म है। उनका तो धर्म ही आजीविका कमाना है और उसके प्रति वे ईमानदार हैं। आप क्या देखते हैं, कहाँ अपना धन व्यय करते हैं, यह आपके विवेक पर निर्भर है। यह सत्य हो सकता है कि कलाकारों का चयन उचित रूप से नहीं किया गया हो, तो यदि आपका हृदय नहीं मानता, तो उस पर अपना धन व्यय न करें। यदि आप सोच रहे हैं कि कोई मनुष्य राम हो सकता है अथवा कोई स्त्री सीता हो सकती है, तो आप स्वयं अपने धर्म से दूर हैं। स्वयं भगवान राम भी दूसरा राम नहीं बन सकते, न ही माता सीता कोई दूसरी हो सकती हैं। यदि आपको भगवान को चलते हुए देखना है, बोलते हुए सुनना है, उनके सौंदर्य को निहारना है, तो किसी आचार्य के पास जाइए और उनसे भगवान की कथा सुनिए। मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि जिस भाव और प्रेम रस में डूबकर आचार्य भगवान की लीलाओं का वर्णन करते हैं, वे लीलाएँ आपको अपने समक्ष घटित होती प्रतीत होंगी। माखन खाते कन्हैया हों अथवा विराट रूप धारण किए हुए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान के पीछे निवाला लेकर दौड़ती माता कौशल्या हों अथवा माता शबरी की प्रतीक्षारत कुटिया - सब कुछ आपके सामने स्वयं ही प्रकट हो जाएगा। नोट - जिस चलचित्र पर इतनी चर्चा हो रही है, उसे देखने की कोई इच्छा नहीं है। अभी तक जो भी धार्मिक इतिहास की कथाओं पर आधारित चलचित्रें आई हैं, उनमें से अधिकांश नहीं देखी हैं। जो देखी हैं, उन्हें केवल मनोरंजन के दृष्टिकोण से देखा है, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं।
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एक मिसरा हूँ मैं, एक मिसरा हो तुम दोनों मिल जाएं तो शे'र हो जाएगा!💜 ~ताहिर फ़राज़
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मईया का प्रेम बंधन ❤️
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इससे अच्छा तो The Legend Of Prince Rama के म्यूजिक राइट्स लेकर ही बना देते...जब रीमिक्स और रीक्रिएशन ही करना है...न्यू की नींव तो रामानंद सागर जी ही भर गये थे...जिसको सुनते ही आज भी प्रेमी जनों के कर श्रद्धा से बद्ध हो जाते हैं!
हैंस जिमर, ए.आर और कुमार तीनों से अच्छा collaboration तो गाँव की चाची लोग कर लेती हैं...! शायद महान लोग ऐसा ही ऑस्कर विनिंग क्रियेशन सुनते हैं... यूपी 78 वाले तो शादी, बारातों में ‘सिय रघुवर कोमल कमलनयन...’ ही बजाते आए हैं और आगे भी यही बजता रहेगा...! धर लेओ...अपन...
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